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Bihar election 2020: क्या RJD को मुसलमान और JDU को महादलितों के सबसे ज्यादा मिलते हैं वोट

बिहार में चुनावी सरगर्मी तेज है. पार्टियों ने अपने प्रचार अभियान तेज कर दिए हैं. ज्यादा से ज्यादा वोटर्स उनसे जुड़ें, इसके लिए लोक-लुभावन वादे भी किए जा रहे हैं. प्रचार के लिए ऑनलाइन से लेकर ऑफलाइन तक का जरिया अपनाया जा रहा है. बिहार में ऐसा कहा जाता है कि समाज के कुछ वर्ग और संप्रदायों का वोट किसी निश्चित पार्टी के लिए हमेशा से फिक्स रहा है. जैसे कि एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के तहत राष्ट्रीय जनता दल को मुस्लिम-यादवों का वोट और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) को महादलितों का वोट शुरू से मिलता रहा है. क्या ये तथ्य सर्वथा सत्य है या फिर इसे जुबानी यूं ही कह दिया जाता है. आइए जानें आंकड़ों में क्या है सच्चाई.

बिहार चुनावों का गणित देखें तो मुस्लिम वोट पहले कांग्रेस को और बाद में आरजेडी की तरफ शिफ्ट हुआ है. 1970 के दशक में बिहार के मुसलमान कांग्रेस का साथ देते रहे लेकिन बाद में परिस्थितियां कुछ ऐसी हुईं कि उनके वोट लालू यादव की तरफ शिफ्ट हो गए. लालू यादव ने बिहार में 15 साल राज किया और इन वर्षों में बिहार के मुसलमान आरजेडी के साथ रहे. इसी के तहत बिहार में माय (मुस्लिम और यादव) समीकरण की बात हर चुनावों में गंभीरता से उठाई जाती है. सवाल है कि मुस्लिम वोट कांग्रेस से क्यों छिटक गया और उसका रुख आरजेडी की तरफ क्यों हुआ? इसे समझने के लिए 1989 का भागलपुर दंगा मामला देख सकते हैं.

इस घटना के बाद बिहार के मुसलमान कांग्रेस से दूर हुए और आरजेडी की तरफ पूरी तरह शिफ्ट हो गए. नतीजा रहा कि बिहार में लालू यादव की अगुवाई में सरकार बनी. लालू यादव ने मंडल कमीशन के जरिये बिहार के पसमांदा मुस्लिम जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रबंध किया. इसका फायदा लालू यादव की पार्टी आरजेडी को मिला और बिहार में वे 15 साल तक हुकूमत करते रहे. कांग्रेस से मुस्लिम वोटर्स के छिटकने का एक कारण और बताया जाता है. 1970 के दशक में बिहारी मुस्लिमों की कई जगह हत्याएं हुई थीं. मुस्लिम समुदाय के कई नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस घटना के खिलाफ अभियान तेज किया और मुसलमानों के बीच कांग्रेस विरोधी भावनाओं को जगाया. इसका नतीजा हुआ कि मुस्लिम वोटर्स को आरजेडी में एक नया विकल्प दिखा और वे उससे जुड़ते चले गए.

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जेडीयू से क्यों छिटके मुसलमान
जानकार मानते हैं कि मौजूदा वक्त में नीतीश कुमार को शायद ही मुसलमानों का वोट मिले. इसके पीछे कई वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह बीजेपी के साथ उनका गठबंधन है. बीजेपी को शुरू से मुसलमानों का वोट नहीं मिला है. इस बार वे बीजेपी के साथ गठबंधन हैं तो ये वोट उनसे फिर छिटकेंगे. बिहार में लगभग 18 फीसद मुस्लिम वोटर्स हैं और यह वोट 1990 से आरजेडी को मिलता रहा है. इस बार भी जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने और नागरिकता संशोधन कानून आने के बाद बिहार में मुस्लिम वोटर्स आरजेडी को वोट दे सकते हैं. इसी तरह एक मुद्दा एनआरसी का है जिसे लेकर जेडीयू ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का समर्थन किया है. इन दोनों कानूनों का असर बिहार चुनाव पर साफ देखा जाएगा जिसका घाटा जेडीयू को उठाना पड़ सकता है. हालांकि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू पिछले चुनाव में जब महागठबंधन में थी, तब मुसलमानों का ठीक समर्थन मिला था. बाद में उनकी पार्टी महागठबंधन से अलग हो गई जिसका असर मुस्लिम वोट पर दिखा. 2019 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों ने बड़ी संख्या में आरजेडी को वोट दिया और जेडीयू को ठुकरा दिया. तकरीबन 89 फीसद मुसलमानों ने आरजेडी गठबंधन को वोट दिया था.

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बिहार में महादलितों का किसे समर्थन
बिहार में दलित और महादलितों का एक बड़ा वोट बैंक है. इसे देखते हुए हर पार्टी अपना एक दलित-महादलित चेहरा प्रमुखता से आगे रखती है. जेडीयू में जहां अशोक चौधरी यह चेहरा हैं तो एलजेपी में चिराग पासवान और आरजेडी में श्याम रजक. इन सबके बीच हिंदुस्तान आवाम मोर्चा यानी हम के अध्यक्ष जीतन राम मांझी भी हैं जो इस बार जेडीयू के साथ चुनाव लड़ रहे हैं. जातिगत आंकड़ा देखें तो बिहार में दलित 17 और महादलित 14 फीसद के आसपास हैं. दोनों को जोड़ दें तो 31 फीसद की बड़ी आबादी है जिनके वोट किसी पार्टी के लिए जीत-हार तय कर सकते हैं. सभी पार्टियां इस वोट बैंक पर नजर रखती हैं. महादलितों के बारे में एक मिथक है कि इसका बड़ा तबका नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को वोट करता है. लेकिन आंकड़ों से साफ है कि यह वोट बड़े स्तर पर बंटा हुआ है. पिछले कई चुनावों में यह वोट आरजेडी, कांग्रेस, जेडीयू और एलजेपी के बीच बंटा रहा है. इसका बड़ा कारण यही है कि हर पार्टी इन वोटर्स को लुभाने के लिए किसी बड़े दलित या महादलित चेहरे को अपने से जोड़े रखती है.

बीजेपी को पिछले चुनावों में दलितों का वोट इसलिए मिला क्योंकि उनके साथ रामविलास पासवान जुड़े रहे. बिहार में पासवान जाति की आबादी करीब 4 फीसद है. शुरू से बीजेपी-एलजेपी का गठबंधन रहा जिसके कारण पासवान समुदाय के सबसे बड़े नेता रामविलास और बीजेपी को इस तबके का फायदा मिला. इस बार ऐसा होता नहीं दिखता क्योंकि चिराग पासवान खुद बगावती हैं और वे 143 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ सकते हैं. हालांकि बीजेपी को जरूर फायदा होगा क्योंकि एलजेपी केंद्र में गठबंधन में है और दोनों पार्टियों के बीच संबंध मुधर रहे हैं. पासवान जाति का वोट जेडीयू से छिटकेगा क्योंकि चिराग पासवान ने नीतीश कुमार के खिलाफ खुलेआम मोर्चा खोल दिया है. नीतीश कुमार इन सभी आशंकाओं के बीच पहले से अशोक चौधरी और जीतन राम मांझी को प्रमुखता से पार्टी में जगह देते रहे हैं, लेकिन देखने वाली बात होगी कि दलित-महादलित वोटर्स चिराग पर भरोसा करते हैं या नीतीश पर.

 

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