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वायरल वीडियो की अंधेरी दुनिया

सोलह साल के करण त्रिपाठी (परिवर्तित नाम) के लिए एक छींक भी प्रसिद्धि का सबब है. लखनऊ का छात्र त्रिपाठी जब मैगी खा रहा था तो उसे अचानक लगातार छींकें आने लगीं. उसके दोस्त ने उसकी छींकों का वीडियो बना लिया. टिकटॉक और यूट्यूब पर इस वीडियो को 20,823 लाइक और 200 कमेंट मिले. इससे पहले त्रिपाठी के टिकटॉक पर 90 फॉलोअर थे लेकिन इस वीडियो के बाद उसके फॉलोअर्स की संख्या पांच हजार के नजदीक पहुंच गई. स्कूल में भी हर कोई उस वीडियो की बात कर रहा था. घर में भी उसके परिवार के वाट्सऐप ग्रुप पर शुभकामनाओं का तांता लगा हुआ है. उसका कहना है, “इससे पहले लोग मेरी तरफ देखते नहीं थे लेकिन अब कॉलोनी के अनजान लोग भी मेरे मित्र होना चाहते हैं.”

लेकिन कुछ दिनों में जब वीडियो की लोकप्रियता खत्म हो गई तो त्रिपाठी ने फिर प्रयास किया. उसने खुद का नाचते हुए वीडियो, जबरन हिचकियां लेने वाला वीडियो, साइकिल स्पोक का वीडियो अपलोड किया लेकिन किसी भी वीडियो को 50 से ज्यादा लाइक नहीं मिले. पिछले साल नवंबर में उस पर टिकटॉक पर ट्रेंड हुए एक वीडियो का बहुत असर हुआ जिसमें दो युवक बाइक पर गन लहराते हुए चल रहे थे. 18 साल का राहुल धनगर और कन्हैया ने मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ में हाईवे पर कट्टा लहराते हुए बाइक दौड़ाकर अपना टिकटॉक वीडियो बनाया था. धनगर, त्रिपाठी से केवल दो साल बड़ा था और उसके टिकटॉक पर 10,000 फॉलोअर थे. त्रिपाठी कहता है, “मैंने सोचा वे लोग बहुत कूल दिख रहे हैं.” वह याद करता है कि कैसे 10 सेकेंड की क्लिप में दोनों कट्टा लेकर बाइक चला रहे हैं.

त्रिपाठी दरअसल उस वीडियो से निकलने वाली मर्दानगी की छवि से बहुत प्रभावित था. इस वजह से उसने भी इंटरनेट पर तरह-तरह की गन के वीडियो पोस्ट करना शुरू कर दिया. उसे ये नहीं पता था कि आर्म्स ऐक्ट के तहत अवैध हथियार रखने के के जुर्म में टिकटॉक वीडियो के आधार पर धनगर और कन्हैया गिरफ्तार हो चुके हैं. उसे यह भी नहीं पता कि एक साधारण से वीडियो से उसे बहुत बड़ी समस्या का सामना करना पड़ सकता है. त्रिपाठी का कहना है, “मेरे फॉलोअर गन की पोस्ट लाइक करते हैं. वे अक्सर कहते हैं कि वे भी मेरे जैसा ‘मर्द’ बनना चाहते हैं.” बहरहाल त्रिपाठी का अकाउंट अब उसके परिवार वालों ने बंद करा दिया है. उसने गन के कुल 62 वीडियो पोस्ट किए और स्कूल में दूसरे अभिभावकों ने भी उसकी शिकायत की. अभी उसकी सोशल मीडिया बेचैनी की काउंसलिंग चल रही है.

मंदसौर के पुलिस अधीक्षक हितेश चौधरी कहते हैं, “स्कूल और कॉलेज के बच्चे अक्सर नहीं जानते कि आपराधिक या अपमानजनक वीडियो अपलोड करने के दूरगामी परिणाम होते हैं. आपके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने का परिणाम ये होगा कि रोजगार की संभावनाओं और चरित्र प्रमाणपत्र तक पर असर पड़ सकता है. ये सब कुछ एक वीडियो की वजह से होगा.” जिले की साइबर सेल ने धनगर और कन्हैया को अवैध हथियारों के आधार पर चिन्हित किया था. साइबर क्राइम के वकील पुनीत भसीन कहते हैं, “ एक पल को ये बहुत बड़ा काम लग सकता है लेकिन जब आप शूट करने के लिए अवैध चीजों का इस्तेमाल करते हैं या अपमानजनक चीजें पोस्ट करते हैं तो ये अपराध होता है. अगर आपकी जिंदगी वीडियो वायरल करना ही है तो फिर कंटेंट क्रिएटर अपनी जिम्मेदारी और नियम भूल जाते हैं. ”

कोई भी प्रसिद्ध हो सकता है आजकल

पिछले साल चीनी मोबाइल वीडियो प्लेटफॉर्म टिकटॉक पर भारतीयों ने 44 फीसद (32.3 करोड़) वीडियो डाउनलोड किए (2018 के मुकाबले 27 फीसद ज्यादा). ये हाल तब था जबकि टिकटॉक को लेकर दुर्घटना में मौत, आत्महत्या और घृणा पैलाने जैसे अनेक आरोप लगे.

कुछ महीनों पहले टिकटॉक पर स्कलब्रेकर चैलेंज चला था. इसमें दो लोग तीसरे आदमी से उछलने को कहते हैं और जब वह उछलता है तो उसके पैर पर पैर मारकर उसे गिरा देते हैं. इससे एक की मौत की जानकारी मिली जबकि अन्य को गंभीर चोटें आईं. लेकिन इस वीडियो प्लेटफार्म ने इस पर कोई दखल नहीं दिया.

हाल ही में एसिड अटैक की नकल करने का दहला देने वाला वीडियो टिकटॉक पर आया है. राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसे हटाने के लिए कहा. फैजल सिद्दीकी नामक यूजर ने इसे बनाया है जिसके 1.3 करोड़ फॉलोअर हैं. लड़की पर एक तरल पदार्थ फेंकते हुए वीडियो में वह कह रहा है, “उस आदमी ने तुम्हें छोड़ दिया है जिसके लिए तुमने मुझे छोड़ा था?” वीडियो का अंत उसके बदले हुए चेहरे के साथ होता है-वह एसिड अटैक के बाद के दागों को छिपाने के लिए मेकअप करती है.

इन दोनों घटनाओं पर फिर टिकटॉक ने बयान दिया, “लोगों की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है और हमारी सेवाओं की शर्तें और कम्युनिटी गाइडलाइन स्पष्ट करते हैं कि इस प्लेटफॉर्म पर क्या स्वीकार्य नहीं है. हमारी पॉलिसी दूसरों को खतरा पहुंचाने वाले, शारीरिक क्षति और महिलाओं के खिलाफ हिंसा वाली सामग्री को अनुमति नहीं देता. हमने बर्ताव वाली सामग्री हमारी पॉलिसी को गाइडलाइन्स का उल्लंघन करते हैं और हमने ऐसी सामग्री को हटा दिया है, अकाउंक को निलंबित कर दिया है और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.”

लेकिन वीडियो आने के बाद से ही भारत में टिकटॉक पर रोक की मांग ट्विटर पर ट्रेंड कर रही है जबकि ऐप की रेटिंग 4.5 से गिरकर 1.3 रह गई है. लेकिन चिंताएं दूसरी भी हैं. टिकटॉप बंद करने से पोस्ट की जरूरत खत्म नहीं हो जाएगी जो कि पिछले कुछ वर्षों में पनपी है. डिजिटल कंटेट का स्वरूप बदलने के लिए ये समझना जरूरी है कि वह कौन सी चीज है जो लोगों को टिकटॉक जैसे प्लेटफार्म तक लेकर जाती है. साथ ही पोस्ट के बारे में उनकी जागरूकता के स्तर में भी बदलाव की जरूरत है कि वे क्या पोस्ट कर रहे हैं.

आखिर वह क्या है जो टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म को इतना आकर्षक बनाता है. सोशल मीडिया कंटेंट में नाटकीय बदलाव आए हैं. एक वायरल वीडियो में प्रसिद्धि सबसे बड़ा पुरस्कार है और डिजिटल फैन्स की संख्या लोगों में आकर्षण पैदा करती है. व्हाट मिलेनियल्स वांट पुस्तक के लेखक विवान मारवाह कहते हैं, “इंस्टाग्राम पर आपको ग्लैमरस दिखना होता है. वहां नजरों में चढ़ने के लिए सिर्फ इतना ही करना होताहै. लेकिन टिकटॉक में कामयाब होने के लिए आपको पैसे की जरूरत नहीं है. टिकटॉक देश में अब तक व्यापक रूप से गैर राजनीतक है. ये अब भी मजे की जगह है.”

एम 56 स्टूडियो के प्रोडक्ट हेड आकाश सेनापति कहते हैं, “इनमें प्रवेश की बाधाएं बहुत सीमित हैं क्योंकि प्रोडक्शन की लागत बहुत कम है. टिकटॉक पर आपको अपनी मर्जी का वीडियो बनाने के लिए बहुत महंगे फोन या बड़े एडिटिंग टूल की जररूत नहीं होती है. आप इसकी तुलना यूट्यूब के वीडियो से करें जहां कंटेंट क्रिएटर वीडियो को ऑनलाइन करने से पहले उस पर बहुत काम करते हैं और बहुत समय देते हैं.” शून्य लागत और साधारण तरीके से लोकप्रिय हो जाने का लालच बहुत कम लोग छोड़ पाते हैं. एमिटी यूनिवर्सिटी में संचार विभाग की प्रोफेसर आंचल सिंह कहती हैं, “वायरल वीडियो से अभिमान संतुष्ट होता है और सेलेब्रेटी की तरह मान्यता मिलने की चाहत बढ़ती है.” इस तरह के वीडियो हर उम्र (19 साल के लकी डांसर के करीब 25 लाख फॉलोअर हैं और अक्षय पात्र के दादी मां के नाचने वाले वीडियो को औसतन दस लाख लाइक्स मिले) और लिंग (ट्रांससेक्सुअल रोई जान के ड्रेस व अन्य चीजों को 34 लाख लाइक मिले) की सीमाओं से ऊपर हैं.

सोशल मीडिया की प्रसिद्धि बनती आदत

बेंगलूरू की 29 साल की सोशल मीडिया एडिक्ट ज्योति सिंह उन दिनों को याद करती हैं जब वे हर विचार और भावना को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देती थीं. कई बार तो वे 2-3 दिनों तक सोती भी नहीं थीं इस उम्मीद में कि उनके मित्र और साथी कुछ प्रतिक्रिया देंगे. वे कहती हैं, “मैं बेकाबू थी. मुझे पता था ये अच्छा नहीं है. यहां तक कि लोगों ने मुझे ट्रोल भी किया. फिर भी मैं नहीं रुकी. जब कोई कहता कि मैं उसे पसंद हूं तो ये मेरे लिए बड़ी बात होती थी.”

इनकी कहानी पोस्ट डालने की तीव्र इच्छा बताती है. 2018 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ट्रेवर हेंस और अन्य लोगों के अध्ययनों से जो बात सामने आई है वह यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नोटिफिकेशन रिसीव करने से दिमाग में डोपामाइन नामक रसायन का स्तर बढ़ जाता है. डोपामाइन हमारे उन अनुमानों और प्रवृत्तियों को मजबूत करता है जो हमें आनंदायक चीजों को दोबारा हासिल करने के लिए प्रेरित करती हैं. हमारा दिमाग उन्हीं चीजों को प्रमुखता देता है जिनसे हमें अच्छा महसूस होता है, इसलिए हम उसे और ज्यादा हासिल करने के लिए और ज्यादा प्रयत्न करते हैं. ये ठीक वैसा ही है जैसा खाने, नशे, सेक्स, जुआ और कसरत के जुनून में होता है. डोपामाइन दो तरह के व्यवहार को प्रोत्साहित करता है एक लक्ष्य आधारित और दूसरा आदत से संचालित. लक्ष्य आधारित व्यवहार में हम लॉग ऑन करते हैं, आर्टिकल पोस्ट करते हैं और काम में जुट जाते हैं. लेकिन अगर हम यही काम लगातार करते रहें तो ये आदत होती है. आदत हमारी प्रतिक्रिया को और तेज कर देती है.

भुला दिए जाने का भय

हम चाहते हैं कि सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि कैसे हासिल की जाए. आपको एक वीडियो पर 10 लाख फॉलोअर मिल जाते हैं और अगला वीडियो ठीक से नहीं चल पाता. यही है भुला दिए जाने का भय. आंचल सिंह के मुताबिक, “इस दशक में हर कोई 15 सेकेंड की प्रसिद्धि पा सकता है. लेकिन नाम और बदनाम में फर्क है. वायरल वीडियो के मामले में कई लोग मानते हैं कि वे बहुत अनोखी और ट्रेंडी चीजें कर रहे हैं. लेकिन ये कहना मुश्किल है कि कौन-सा वीडियो वायरल होगा. एक बात जरूर स्पष्ट है कि ज्यादातर सोशल मीडिया यूजर खुद को वीडियो के जरिये बेचने का कारोबार कर रहे हैं- जो कि उनके विचार, उत्पाद, प्रसिद्धि, छवि कुछ भी हो सकती है.”

इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड साइंसेज, नई दिल्ली के डायरेक्टर और साइकेट्रिस्ट निमेश देसाई कहते हैं, “स्वीकृति पाने की चाह दिमाग की तार्किक सोच को बाधित करती है. सोशल मीडिया में मैसेज देने और प्रतिक्रिया पाने की हड़बड़ाहट बढ़ा दी है. आप एक वीडियो पोस्ट करते हैं और निश्चित प्रतिक्रिया की अपेक्षा करते हैं. अगर वह प्रतिक्रिया नहीं आती है तो आप कुंठित होते हैं और आपमें खारिज कर दिए जाने की भावना आती है.”

उन लोगों पर दबाव खासतौर पर ज्यादा है जो वायरल कंटेंट बनाने की अपनी योग्यता के आधार पर नौकरी पर लिए गए हैं. इनकी जिंदगी वायरल होने पर ही निर्भर है. डिजिटल इनफ्लूएंसर मार्केटिंग एजेंसी रिपल लिंक्स के प्रमुक दीपक सखूजा कहते हैं, “सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को किसी ब्रांड का एंबेसडर बनाने की सलाह देना बहुत कठिन होता है. लेकिन अब लोगों के लिए जिस तरह की फॉलोइंग दिख रही है कई ब्रांड खुद ही इन्फ्लुएंसर की मांग करने लगे हैं. कुछ कंपनियां तो इन्फ्लुएंसर की ट्रेडिंग कर रही हैंसबसे सस्ते और ज्यादा फॉलोअर वाले इन्फ्लुएंसर को कांट्रैक्ट भी मिल जाता है.” इसके लिए ब्रांड 50 हजार से 10 लाख रुपए तक प्रति इन्फ्लुएंसर खर्च कर देती हैं.

35 साल की टिकटॉक फूड ब्लॉगर आकृति बनर्जी याद करती हैं, “मैं छह घंटे वे इस इंतजार में रहती थी कि उनके वीडियो को कितने लाइक्स मिले. केवल 200. पिछले वीडियो को 10 हजार से ज्यादा मिले थे. मैं एक कुकवेयर कंपनी के बहुत ज्यादा दबाव में रहती थीं कि इतने लाइक्स आएं. मैं रात को भी यही सोचती रहती थी.” बनर्जी ने सारे सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक साल पहले छोड़ दिए हैं. वे कहती हैं, “मैंने दुनिया को इसी नजरिये से देखना शुरू कर दिया था कि क्या वायरल है और क्या नहीं. इससे मेरी असल जिंदगी में जीने की काबिलियत बाधित हो रही थी. सोशल मीडिया फैन बहुत जल्दी आते-जाते हैं. आपको पता नहीं चल सकता कि शुरुआती उत्साह कहां चला गया. बस दबाव हमेशा बना रहता है.”

यह दबाव जिंदगी और मौत का सबब बनता है. नई दिल्ली में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के शोधकर्ताओं ने पाया कि 2011 से 2017 के बीच दुनियाभर में 259 सेल्फी मौतों और हादसों में से आधे भारत में हुए. टिकटॉक डेथ ट्रैकर के मुताबिक 2018 के बाद से 40 टिकटॉक मौतों में से 33 भारत में हुईं. भारत में इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है.

औसतन हर भारतीय 1,800 घंटे हर साल फोन की स्क्रीन देखने में बिताता है. डिजिटल डिटॉक्स 21वीं सदी का ही शब्द है और अब ये जरूरी हो गया है. कोविड महामारी हमें डिजिटल स्कूलिंग, वर्क और यहां तक कि डिजिटल व्यक्तिगत आयोजन तक के लिए बाध्य कर रही है. लेकिन सोशल मीडिया की दीवानगी असल जिंदगी पर बुरा असर डाल रही है और इसे नियंत्रित करना वक्त की जरूरत है.

(अनुवादः मनीष दीक्षित)

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