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डॉ. नरेश त्रेहान मामले में एक-दो नहीं, 7 आरोपों की होगी जांच, पढ़ें मेदांता मामले की इनसाइड स्टोरी

गुरुग्राम. दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम (गुड़गांव) के चर्चित मेदांता अस्पताल (Medanta Hospital) के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED ) ने एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम देते हुए से बुधवार को मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत मामला दर्ज किया है. मेदांता अस्पताल की मूल कंपनी का नाम है ग्लोबल हेल्थ प्राइवेट लिमिटेड. केंद्रीय जांच एजेंसी ED ने मेदांता अस्पताल के फाउंडर डॉ. नरेश त्रेहान समेत 16 लोगों के खिलाफ के खिलाफ मामला दर्ज किया है. इसके साथ-साथ ग्लोबल इंफ्राकॉम प्राइवेट लिमिटेड सहित पुंज लॉयड, सुनिल सचदेवा, अनंत जैन, अतुल पुंज के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है. ईडी इस मामले में एक-दो नहीं, बल्कि 7 आरोपों की जांच करने वाली है.

हरियाणा पुलिस द्वारा दर्ज FIR में जिन 52 लोगों और कंपनियों के नाम हैं, उन सभी के खिलाफ ईडी अब विस्तार से जांच-पड़ताल करेगी. इस मामले में ईडी को शुरुआती जानकारी मिली है कि इस प्रोजेक्ट में हुए भ्रष्टाचार में हरियाणा के सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी है. ऐसे अफसरों की गैर जिम्मेदराना हरकत से ही इतने बड़े भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया था. ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA ) के तहत दर्ज मामले की पड़ताल जल्द ही शुरू होने वाली है. ईडी के मुताबकि तफ्तीश के दौरान भ्रष्टाचार से जुड़े कई और आरोप भी सामने आ सकते हैं. ईडी की टीम जल्द ही मामले के आरोपियों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू करने वाली है.

अदालत के आदेश पर दर्ज हुआ मुकदमा

दरअसल, ये मामला गुड़गांव के सेक्टर 38 से जुड़ा हुआ है, जहां मेडिसिटी बनाने के लिए 53 एकड़ भूमि के आवंटन में गड़बड़ी हुई है. RTI एक्टिविस्ट अमन शर्मा ने इस मामले में FIR दर्ज करवाने के लिए जून 2019 में पहले ईडी में ही शिकायत की थी. ईडी ने शिकायत की कॉपी जांच के लिए हरियाणा पुलिस को भेज दी थी. लेकिन मामले में कार्रवाई नहीं होता देख शिकायतकर्ता ने कोर्ट में याचिका दायर की, जिसके बाद अदालत ने हरियाणा पुलिस को जल्द से जल्द मामला दर्ज करने का आदेश दिया. इसके बाद इसी मामले को आधार बनाते हुए ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है.क्या है मेदांता मेडिसिटी अस्पताल प्रोजेक्ट मामला

साल 2004 में हरियाणा के गुड़गांव में मेदांता मेडिसिटी अस्पताल प्रोजेक्ट की स्थापना की गई थी. इसके तहत आधुनिक अस्पताल के साथ-साथ मेडिकल शोध संस्थान, नर्सिंग स्टाफ के लिए घर, आधुनिक मेडिकल कॉलेज सहित मरीजों के रिश्तेदारों के रहने के लिए गेस्ट हाउस जैसी कई सुविधाओं को विकसित किया जाना था. मंशा ये थी कि गुड़गांव सहित हरियाणा को देश में बेहतरीन मेडिकल सुविधाओं के लिए जाना जाए. कल्पना तो यहां तक थी कि दिल्ली से भी बड़े-बड़े अस्पताल यहां पर हों, ताकि हरियाणा को लोगों को इलाज के लिए दूसरी जगह न जाना पड़े. लेकिन नियमों को ताक पर रखकर प्रोजेक्ट के तहत मात्र एक अस्पताल बनाकर छोड़ दिया गया. आज ED की एफआईआर में ये आरोप भी लगाए गए हैं कि इस प्रोजेक्ट से करोड़ों रुपए कमाकर विदेशों में और दूसरे अन्य राज्यों में निवेश किया गया. इस प्रोजेक्ट को 2009 में तैयार कर लेने का लक्ष्य था, लेकिन पिछले करीब 15 सालों से इस मामले में फर्जीवाड़े को अंजाम देकर गड़बड़ियां की गईं, जिन पर अधिकारियों या सरकार का ध्यान नहीं गया है.

ईडी इन बिंदुओं पर करेगी जांच

1- आरोप है कई शेल कंपनियां बनाकर बाहर के देशों और देश के अन्य राज्यों में व्यक्तिगत कार्यों के लिए पैसे का निवेश किया गया. ईडी शेल कंपनियों के निर्माण और विदेशी निवेश की जांच करेगी.

2- मेदांता मेडिसिटी प्रोजेक्ट के लिए जितनी राशि का निवेश कानूनी तौर डॉ. नरेश त्रेहान और उनकी कंपनी ने बताया है, वह गलत है. कंपनी के पास उस वक्त निवेश की रकम का मात्र 10 फिसदी ही सबस्क्रिप्शन एमाउंट था. लेकिन इस मसले पर सरकार की ओर से शुरुआती जांच नहीं की गई.

3- कथित कंपनी को बिना पूर्व भुगतान के ही गलत तरीके से शेयर दे दिया गया, जिस पर सवाल उठाना सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी थी, लेकिन वो नहीं किया गया.

4- हरियाणा सरकार ने इस मामले में स्वास्थ विभाग से जुड़े किसी अधिकारी को नियुक्त नहीं किया, जिससे प्रोजेक्ट पर नजर नहीं रखी जा सकी. इस कारण मेडिसिटी प्रोजेक्ट तय समय पर पूरा नहीं हो सका. ये भी इस मामले में बड़ी लापरवाही और संदेह का बिंदु है.

5- मेडिसिटी प्रोजेक्ट मामले में कंपनी की वित्तीय मामलों से जुड़ी जांच नहीं की गई, यानी कंपनी के बैंक एकाउंट सहित अन्य संपत्तियों की आकलन का काम नहीं हुआ. सरकार ने कंपनी और उसके लेन-देन को ऑडिट कराने का काम भी नहीं किया.

6- शुरुआती रिपोर्ट में इस बात की भी जानकारी मिली है कि मेडिसिटी प्रोजेक्ट को पास कराने में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ. मेडिसिटी को प्रोजेक्ट दिलाने के लिए दूसरी कंपनी को आगे नहीं आने दिया गया, जिसका फायदा मेडिसिटी प्रोजेक्ट से जुड़ी कंपनियों को हुआ. इसकी भी अब जांच होगी.

7- किसी सरकारी प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद कंप्लीट होने के बाद एक ऑक्युपेशन (Occupation Certificate) प्रमाणपत्र मिलता है, आरोप ये भी है कि वह प्रमाणपत्र भी भ्रष्टाचार के माध्यम से प्राप्त किया गया. जबकि सच्चाई ये है कि ये प्रोजेक्ट पिछले 15 सालों से अधूरा पड़ा है.

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