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लॉकडाउन के बाद क्या बच्चों की तस्करी का ख़तरा बढ़ जाएगा?


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भारत में काम कर रही कुछ ग़ैर-सरकारी संस्थाओं ने लॉकडाउन के बाद बाल तस्करी बढ़ने की आशंका जताई है. इस सिलसिले में इन संस्थाओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली है.

इस याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर बाल तस्करी रोकने के लिए क़दम उठाने को कहा.

अपनी याचिका में बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था बचपन बचाओ आंदोलन ने कहा, ”उसे विश्वसनीय जानकारी मिली है कि लॉकडाउन खुलने के साथ बाल तस्करी के मामले बहुत ज़्यादा बढ़ जाएंगे. कई स्रोतों से जानकारी मिली है कि तस्कर सक्रिय हो गए हैं, संभावित पीड़ितों और परिवारों से संपर्क कर रहे हैं और कई परिवारों को एडवांस पेमेंट भी कर रहे हैं.”

सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका में कहा गया है, “लाखों प्रवासी मज़दूरों, दिहाड़ी मज़दूरों के लिए लॉकडाउन आफ़त बनकर टूटा. हज़ारों पैदल ही अपने गांवों को लौटे. हालांकि ये हृदयविदारक सच्चाई है कि वहां भी ग़रीबी और भूख उनका इंतज़ार कर रही थी, क्योंकि गांव में काम ना मिलने की वजह से ही तो वो शहरों की तरफ़ गए थे. कईयों को भारी ब्याज दरों पर क़र्ज़ लेना पड़ेगा. जो मज़दूर शहरों में ही फँसे रह गए, उनके लिए स्थितियां और ख़राब होंगी. ना पैसा, ना सुरक्षा और ना खाना. कोरोना से खड़े हुए आर्थिक संकट ने असुरक्षा और ग़रीबी बढ़ाई है. बाल तस्कर, संघर्ष कर रहे परिवारों की स्थितियों का फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे. कृषि संकट से जूझ रहे किसान परिवारों के बच्चों को भी शिकार बनाया जाएगा.”

क्यों बढ़ रही बाल मज़दूरों की माँग?

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याचिका में कहा गया है कि जब लॉकडाउन हटाया जाएगा और सामान्य गतिविधियां शुरू की जाएगी, तो फ़ैक्ट्री मालिक अपने आर्थिक नुक़सान की भरपाई करने के लिए सस्ते लेबर की तलाश करेंगे. और इसका सबसे आसान तरीक़ा है बाल मज़दूरों को काम पर रखना. साथ ही सड़कों पर भीख माँगने वाले बच्चों की तादात भी बढ़ेगी.

बाल तस्करी की दूसरी वजह है देह व्यापार के लिए मानव तस्करी की जाएगी. याचिका में कहा गया है कि, नाबालिग़ लड़कियों को ख़रीदकर वैश्यावृति के लिए बेचा जाएगा. लॉकडाउन की वजह से देह व्यापार में जो नुक़सान हुआ है, उसे “हाई-रिटर्न इन्वेस्टमेंट यानी कम उम्र की लड़कियों” से पूरा करने की कोशिश की जाएगी.

तस्करी का एक और हल्का रूप है, बाल विवाह. जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 और पोक्सो के तहत अपराध है.

किन राज्यों के बच्चों को सबसे ज़्यादा ख़तरा?

शक्तिवाहिनी संस्था से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता ऋषिकांत बताते हैं – पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम जैसे राज्यों में ज़्यादा ख़तरा है.

उनके मुताबिक़, देह व्यापार के लिए सबसे ज़्यादा पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से तस्करी होती है.

घरों के काम करने के लिए झारखंड, असम से तस्करी की जाती है.

जबरन शादी के लिए लड़कियां, पंजाब और हरियाणा पहुंचाई जाती हैं, क्योंकि वहां सेक्स रेशियो बहुत कम है.

ऋषिंकात का मानना है कि लाखों बच्चों पर तस्करी का ख़तरा है.

पश्चिम बंगाल से सेक्स ट्रैफ़िकिंग का सबसे ज़्यादा डर

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ऋषिकांत कहते हैं कि कोरोना से जूझ रहे पश्चिम बंगाल की अंफन तूफ़ान ने कमर तोड़ दी. तूफ़ान से वहां के कई ग्रामीण इलाक़ों में बहुत नुक़सान हुआ है. कई लोग अब भी शिविरों में रह रहे हैं.

वो कहते हैं कि उन्होंने तूफ़ान प्रभावित गांवों के कई लोगों से बात की, जो बहुत परेशान हैं. ऋषिकांत को डर है कि ख़ासकर दक्षिण 24 परगना इलाक़े से सेक्स ट्रैफ़िकिंग बढ़ सकती है. इस इलाक़े से पहले भी देह व्यापार के लिए सबसे ज़्यादा लड़कियां ट्रैफ़िक होती रही हैं.

तस्करी बढ़ने के ख़तरे को पश्चिम बंगाल की सरकार भी मान रही है. ख़बरों के मुताबिक़, राज्य सरकार के चीफ़ सेकेट्री ने मीटिंग में इस बात का ज़िक्र किया और स्टेट कमिशन प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट ने सारे एसएसपी को नोटिस भी भेजा है और पुलिस को एलर्ट रहने के लिए कहा है. क्योंकि माना जा रहा है कि रेल सेवा शुरू होने से तस्करी भी शुरू हो सकती है.

ऋषिकांत बताते हैं कि 2009 में आए आइला तूफ़ान के बाद भी पश्चिम बंगाल से हज़ारों लड़कियां ट्रैफ़िक हुई थीं.

दिए जा रहे हैं एडवांस पैसे

स्थानीय संस्था आसरा के मुताबिक़, राजस्थान के उदयपुर में तस्कर कुछ परेशान परिवारों को एडवांस पैसे भी दे रहे हैं और उनसे वादा कर रहे हैं कि लॉकडाउन हटने पर वो उनके बच्चों को काम पर लगवा देंगे.

संस्था की माने तो बड़े कारोबारियों ने परिवारों से मोल-भाव करने के लिए राज्य में तस्कर या बिचौलिए नियुक्त किए हैं, ताकि लॉकडाउन के बाद बच्चों को काम के लिए गुजरात और महाराष्ट्र ले जाया जा सके.

इसके अलावा बचपन बचाओ आंदोलन को झारखंड के साहिबगंज ज़िले के एक गांव से भी शिकायत मिली है. एक शख़्स ने बताया कि तस्कर उनकी 14 और 15 साल की दो बेटियों को अपने साथ चलने के लिए बहला-फुसला रहे हैं. संस्था के मुताबिक़, इस तरह के लोग फ़र्ज़ी एज प्रूफ़ बनाने में भी माहिर होते हैं.

जो लौटे, उन्हें वापस भेजने का दबाव

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बिहार स्थित सीतामढ़ी के एक गांव के रहने वाले विशाल (बदला हुआ नाम) ने बाल अधिकार संस्था को ख़त लिखा और बताया कि कैसे उसे गांव से तस्करी कर पंजाब के लुधियाना स्थित एक फ़ैक्ट्री में काम पर लगवाया गया. फिर लॉकडाउन में उसे और उसके साथी बच्चों को गांव भेज दिया गया.

अब तस्कर उसके परिवार पर उसे दोबारा भेजने के लिए दबाव बना रहे हैं. बिहार के कटिहार और सीतामढ़ी ज़िलों से भी ऐसी ख़बरें आई कि परिवारों पर बच्चों को दिल्ली वापस भेजने का दबाव बनाया जा रहा है. कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिन्हें मालिकों ने लॉकडाउन में छोड़ दिया और वो अपने काम की जगह पर ही खाने तक को परेशान हो रहे हैं.

ऋषिकांत के मुताबिक़, देह व्यापार में लिप्त कई महिलाएं भी गांव लौट आई थीं, उन्हें भी वापस लाया जा सकता है.

वक़् रहते क़दम नहीं उठाया तो…

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि अगर बच्चों को तस्करी से बचाया नहीं गया तो लॉकडाउन के बाद उनके साथ होने वाली हिंसा और उत्पीड़न से उन्हें बचाना बहुत मुश्किल होगा और ग़रीब बच्चों की पूरी पीढ़ी ख़तरे में आ सकती है.

सामाजिक संस्थाओं को भरोसा है कि अगर लॉकडाउन उठाए जाने से पहले ज़रूरी क़दम उठाए जाएं, तो ग्लोबाल हेल्थ क्राइसेस के बाद खड़े होने वाले मानवीय संकट को बहुत हद तक रोका जा सकता है.

कोर्ट से अपील की गई है कि बच्चों की तस्करी रोकने के लिए और उनके बचाव और पुनर्वास के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को कोई नीति या गाइडलाइन बनाने का निर्देश देना चाहिए और नीति को लागू करने के लिए सभी राज्यों के मुख्य सचिव को भेजना चाहिए. जिन ज़िलों में तस्करी को लेकर ज़्यादा ख़तरा होगा यानी जहां से बाल तस्करी की जाएगा और जहां उन्हें लाया जाएगा, वहां सेक्शन 31 के तहत डिस्ट्रिक्ट प्लान बनाना चाहिए.

वहीं ऋषिकांत कहते हैं कि “ट्रेनों के मूवमेंट पर भी नज़र रखने की ज़रूरत है. दिल्ली तस्करों की डेस्टिनेशन है. इसलिए बंगाल, आंध्र पर्देश और मुंबई जैसे राज्यों से आने वाली ट्रेनों की स्पेशन मॉनिट्रिंग की जानी चाहिए.”

उनका मानना है कि बच्चों और बच्चियों को तस्करी से पहले ही बचाना होगा और उसके लिए जल्द मेकेनिज़्म बनाना होगा, “इसके लिए शिक्षा विभाग को भी कोशिशें करनी चाहिए. भले ही अभी स्कूल बंद हैं, लेकिन कई बच्चे फ़ोन या व्हाट्सएप के ज़रिए अपने शिक्षकों से जुड़े हैं. ऐसे में शिक्षकों को बच्चों को समझाना चाहिए कि वो किसी की बातों में ना आए, शिक्षक बच्चों के परिजनों से भी बात कर सकते हैं. साथ ही डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट और गांव की पंचायतों से भी बात करने की ज़रूरत है.”

ज़ीरो से शुरू करनी होंगी कोशिशें

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मानव तस्करी को रोकने के लिए सालों से कोशिशें होती रही हैं. इसके लिए मेकेनिज़्म भी तैयार किया गया. पुलिस को ट्रेनिंग दी गई, रेड के ज़रिए बच्चों को निकाला गया, उन्हें रेस्क्यू किया गया, सेल बनाए गए. पार्लियामेंट के आंकड़ों की मानें तो इन कोशिशों से बाल तस्करी को कम करने में भी मदद मिली.

दिसंबर 2018 में एक सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय की ओर से जवाब दिया गया था कि 2015 में पूरे देश में 3905 मामले दर्ज किए गए. वहीं 2016 में पूरे देश में 9034 मामले दर्ज किए गए.

लेकिन ऋषिकांत कहते हैं कि कोरोना त्रासदी ने इस पूरे मेकेनिज़्म को भी ख़त्म कर दिया. जिसके लिए अब ज़ीरो से सबकुछ करना होगा.

वो कहते हैं, “इन सब स्थितियों में हमें पुलिसिंग को मज़बूत करना होगा. चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट को मज़बूत करना होगा. तब जाकर हम मानव तस्करी से लड़ सकते हैं. ये सोच समझ कर किया जाने वाला अपराध है और इस तरह के अपराध से निपटने के लिए आपको भी ऑर्गेनाइज़्ड होना होगा.”

कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब

लाइव लॉ के मुताबिक़, इस मामले में याचिका पर सुनवाई के बाद सीजेआई जस्टिस एस ए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एच एस फुल्का और सॉलिसिटर जनरल से भी रिसर्च कर अगली सुनवाई में सुझाव लाने के लिए कहा. मामले पर अब दो हफ्ते बाद विचार होगा.

सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस ने कहा, “हम चाहते हैं आप थोड़ा होमवर्क करें…कोई तरीक़ा निकालिए कि अगर कहीं किसी बच्चे से काम करवाया जाता है तो क्या किया जा सकता है. क्या प्राइवेट काम करने वाले हर कॉन्ट्रेक्टर को भी कहीं रजिस्टर किया जा सकता है? ये मसला तो हैं, क्योंकि बाल मज़दूरी का पूरा बाज़ार है. कॉन्ट्रेक्टर को रजिस्टर कीजिए, उनके यहां काम करने वालों की लिस्ट मांगिए, ताकि सुनिश्चित हो सके कि उन्होंने किसी बच्चे को काम पर ना रखा हो. हम ही हैं जो उन्हें एक बाज़ार देते हैं, क्योंकि बाल मज़दूर सस्ता होता है. हमें कॉन्ट्रेक्टर से शुरू करना होगा?”

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों (असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, तेलंगाना) को बाल तस्करी रोकने के लिए क़दम उठाने को कहा.

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