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चीन से विवाद के बीच नेपाल के नए फ्रंट से निपटना भी भारत के लिए चुनौती, टकराव के तेवर में ओली सरकार

चीन के साथ सीमा विवाद के बीच नेपाल का नया फ्रंट भी भारत के लिए चुनौती बना हुआ है। जानकार मानते हैं कि नेपाल के साथ विवाद को हल्के में नहीं लेना चाहिए। नेपाल ने जिस वक्त पर विवाद खड़ा किया उसकी टाइमिंग भी सवाल खड़ा करती है। नक्शा संशोधन के पहले भारत से बातचीत का प्रस्ताव नेपाल द्वारा गंभीरता से न लेना भी दिखाता है कि नेपाली नेतृत्व इस समय टकराव के तेवर में है। नेपाल और भारत के बीच क़रीब 1880 किलोमीटर सीमा खुली हुई है। दोनों देशों में 98 फ़ीसदी सीमा को कवर करने वाले नक़्शे पर सहमति है, लेकिन पश्चिमी नेपाल में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा वो क्षेत्र हैं जिन पर तनाव जारी है।

भारत मानता है कि नेपाल लिम्पियाधुरा पर नया दावा कर रहा है। करीब 200 साल तक उसने इस इलाके पर कोई दावा नही किया। कई ऐसे क्षेत्रों में जहां सीमा पर समझ को लेकर कोई विवाद नही है वहां सीमांकन के लिए बनाए गए पिलर ढहाए जाने की घटनाओं ने भी नेपाल की दोस्ताना सीमा पर नई चुनौतियों का इशारा किया है। जानकारों का कहना है कि नेपाल ने 1816 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं से हार के बाद अपने पश्चिमी क्षेत्र का एक हिस्सा छोड़ दिया था। इसके बाद की सुगौली संधि ने काली नदी के उत्पत्ति स्थल को भारत और नेपाल की सीमा तय किया। लेकिन दोनों देश काली नदी के स्रोत को लेकर अलग-अलग राय रखते हैं। इसे लेकर ही विवाद है।

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भारत के लिए लिपुलेख का मामला सुरक्षा से जुड़ा है। साल 1962 में चीन के साथ युद्ध के बाद से भारत की सामरिक स्तर पर अंदरूनी चिंता यह रही है कि कहीं इस पास से चीन घुसपैठ न कर दे। साथ ही भविष्य में किसी भी घुसपैठ के ख़िलाफ़ रक्षा के लिए रणनीतिक लिहाज से ये इलाका अहम है।

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हाल में आर्मी चीफ नरवणे ने कहा था कि सीमा पर कोई विवाद नहीं है। न ही वहां पहले इस तरह की कोई समस्या रही है। हो सकता है कि उन्होंने (नेपाल) किसी और के इशारे पर यह मुद्दा उठाया हो। इसकी संभावना बहुत ज्यादा है। उनका इशारा चीन की ओर था। पूर्व राजनयिक जी पार्थसारथी का कहना है कि 1950 को हुई शांति और मित्रता संधि के आर्टिकल-7 के तहत दोनों देश एक-दूसरे को ये विशेषाधिकार देते हैं। इस विशेष संबंध की जगह कोई नही ले सकता। उन्होंने कहा बेहतर होता नेपाल इसकी अहमियत को समझकर व्यवहार करे।

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जानकारों का कहना है कि नेपाल जो 1990 से पहले सीमा से जुड़े मुद्दे को अनौपचारिक रूप से उठाता था, अब उसने इस एजेंडे को औपचारिक रूप से टेबल पर लाना शुरू कर दिया है। 1997 में भारतीय प्रधानमंत्री आईके गुजराल की नेपाल यात्रा पर आधिकारिक रूप से सीमा विवाद के मुद्दे पर चर्चा की गई थी। 2014 में पीएम मोदी की नेपाल यात्रा से पहले इस मुद्दे पर काम करने के लिए विदेश सचिवों को निर्देश दिए गए थे। इसके पहले भी कई मौकों पर सीमा संबंधी मुद्दों को रेखांकित किया गया।

लंबित पड़े सीमा विवाद (जिनमें कालापानी और सुस्ता शामिल हैं) को सुलझाने के लिए दोनो देशो के बीच रूपरेखा कई बार बनी, लेकिन बात नही बनी। भारतीय पक्ष ने सीमा के लगभग 98% सहमत हो चुके हिस्से पर जल्द हस्ताक्षर करने का जोर दिया। नेपाली पक्ष ने सभी बाकी सीमा मुद्दों को भी हल करने की इच्छा व्यक्त की। जानकार मानते हैं कि भारत को अपने मित्र देश से सहमति के लिए बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए, हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि बातचीत का माहौल बनाने की जिम्मेदारी नेपाल की है।



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