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जर्मन नेता की हत्या के एक साल बाद नव नाजियों की सुनवाई शुरु | DW | 17.06.2020

जून 2019 में करीब से चली गोली से मारे गए जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल की पार्टी के नेता वाल्टर ल्यूबके की हत्या के आरोपी अति-दक्षिणपंथी बताए जाते हैं. हत्या के एक साल बाद दो आरोपियों पर एक जर्मन अदालत में सुनवाई शुरु हो गई है. श्टेफान ई. पर आरोप है कि ”अंधेरे में वह ल्यूबके के घर में घुसा, जहां वह टैरेस में बैठे हुए थे.” आरोपी “चुपचाप पीड़ित के करीब गया और उसने एक रॉसी रिवॉल्वर से काफी करीब से उनके सिर में गोली मार दी.”

इसे पूरी तरह राजनीति से प्रेरित हत्या माना जा रहा है. 66-वर्षीय सीडीयू नेता 2015 से ही कई हिंसक दक्षिणपंथी अतिवादियों की नफरत का निशाना बन गए था. यह वह समय था जब जर्मनी में रिफ्यूजी संकट चरम पर था और शरणार्थियों की एक तरह की बाढ़ सी आई हुई थी. ल्यूबके उन नेताओं में से थे जो खुलकर शरणार्थियों के स्वागत और एकीकरण की कोशिशों का समर्थन कर रहे थे.

ल्यूबके की हत्या ऐसा पहला मामला था जब विश्व युद्ध खत्म होने के बाद से किसी दक्षिणपंथी उग्रवादी ने एक सत्ताधारी नेता को निशाना बनाया था. हालांकि इसके पहले भी शरण के इच्छुक लोगों और आप्रवासी समुदाय के लोगों की हत्या के कई मामले सामने आए थे. ल्यूबके की हत्या के कुछ महीने पहले ही देश में एक कुख्यात नव नाजी महिला आतंकी बीएटे शेपे का मामला खत्म हुआ था. नेशनल सोशलिस्ट अंडरग्राउंड, एनएसयू की सदस्य रही इस आतंकी को जुलाई 2018 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई. उस पर सात सालों में कम से कम दस लोगों की हत्या और दो बम विस्फोट करने का दोष सिद्ध हुआ था. इन सब की साजिश और अंजाम देने का काम शेपे ने अपने दो अन्य साथियों के साथ मिल कर किया था, जो कि खुद भी 2011 में मृत पाए गए थे.

नेता की हत्या से एनएसयू हत्याओं का संबंध कैसे

शेपे को सुनाई गई कड़ी सजा से बाकियों में एक सख्त संदेश जाना चाहिए था लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. इसके बाद भी उन्होंने ल्यूबके को भी वैसे ही दुस्साहसी तरीके से मार डाला जैसे इसके पहले एनएसयू वालों ने नौ आप्रवासियों और एक महिला पुलिसकर्मी को मारा था. 2015 से ही ल्यूबके को धमकी भरी चिट्ठियां और जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं. वे जिस गांव के रहने वाले थे, उसके पास के एक छोटे शहर में जब शरणार्थियों को ठहराने के लिए रिफ्यूजी सेंटर बनाने का निर्णय हुआ, तो सभी संबंधित पक्ष काफी भावुक थे. टाउन हॉल में हुई एक सभा में ल्यूबके ने जोर शोर से प्रोजेक्ट का समर्थन किया था जबकि वहां की 14,000 की स्थानीय आबादी का बड़ा हिस्सा इसके खिलाफ था.

रिफ्यूजी लोगों का स्वागत और जर्मन समाज में एकीकरण करने के समर्थक थे ल्यूबके.

नस्लभेद और नफरत से प्रेरित

हत्या के मामले में आरोपी श्टेफान ई. खुद भी इस सभा में उपस्थित था और माना जा रहा है कि वह ल्यूबके की हत्या से एक साफ संदेश देना चाहता था. हालांकि अभी इन सभी धारणाओं की पुष्टि होनी है लेकिन दक्षिणपंथी हिंसा का माहौल इसके काफी पहले से बना हुआ था जिस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया. ल्यूबके की हत्या से इसमें कुछ बदलाव देखने को मिला और अक्टूबर 2019 में हाले के सिनेगॉग में हुई सामूहिक हत्या की वारदात के बाद जर्मन सरकार के पास इस बारे में जल्द कुछ ना कुछ करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.

केंद्रीय अपराध पुलिस कार्यालय से हाल ही में जारी हुए आंकड़ों को देखने के बाद जर्मन गृह मंत्री होर्स्ट जीहोफर ने बयान दिया कि दक्षिणपंथी कट्टरवादियों ने अपने पीछे “खून की लंबी निशानी छोड़ी है.” इस लंबी कतार में इसी साल फरवरी में हनाऊ में हुई नस्लवादी हिंसा भी है जिसमें 10 लोग मारे गए.

हनाऊ के एक महीने के भीतर जर्मन सरकार ने गृह मंत्री जीहोफर के नेतृत्व में एक विशेष समिति गठित की, जिसका मकसद दक्षिणवादी कट्टरपंथ और नस्लवाद से निपटना है. समिति की पहली बैठक मई के अंत में हुई और नवंबर में समिति कुछ नई घोषणाएं कर सकती है. दक्षिणपंथी हिंसा के शिकार हुए लोगों के लिए काम करने वाले कुछ संगठनों ने इस समिति के गठन पर संतोष व्यक्त किया. देखना होगा कि क्या इससे यह गारंटी भी मिलेगी कि आगे कभी जर्मन नेता दक्षिणपंथी हिंसा के मामलों को नजरअंदाज नहीं करेंगे.

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