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क्या अब गोरखा रेजिमेंट पर राजनीति कर रहा है नेपाल, जानें क्यों देश के लिए अहम ये रेजिमेंट

ऐसा लग रहा है कि भारत की तीन जगहों को अपने नए नक्शे में शामिल करने, इस पर कानून बनाने के बाद अब नेपाल उस गोरखा रेजिमेंट पर भी सियासत खेल रहा है, जो भारतीय सेना की सबसे बहादुर रेजिमेंट मानी जाती है. जिसके बहादुरी के किस्से मशहूर हैं. दरअसल नेपाल सरकार, मीडिया और सरकार के नजदीकी एक प्रतिबंधित संगठन की ओर से जो बयान आए हैं, वो चौंकाने वाले हैं. हम यहां जानेंगे कि गोरखा रेजिमेंट का भारत के लिए क्या महत्व रहा है और नेपाल इसे लेकर क्या राजनीति कर रहा है.

पिछले दिनों अचानक नेपाल और भारत के रिश्तों में कड़वाहट दिखी, जब नेपाल ने कहा कि भारत ने उसके कई इलाकों पर कब्जा कर रखा है, फिर आनन-फानन में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा बनाकर उसे संसद से पास कराया और राष्ट्रपति की मंजूरी लेकर उसे कानून की शक्ल दे दी. हालांकि इससे पहले से ही नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के सुर भारत के लिए बदले हुए थे.

नक्शा पास कराने के बाद नेपाल से जिस तरह के बयान आ रहे हैं, उससे लगता ही नहीं कि ये वही नेपाल देश है, जिससे हमारा सदियों से नाता रहा है.

गर्भनाल भी खा जाते हैं चीन के लोग, मानते हैं नपुंसकता की दवापिछले 70 सालों से भारत ने करीब एकतरफा तरीके से नेपाल की मदद की है. चीन से साथ भारत बढ़ते तनाव के बीच नेपाल में भारत के खिलाफ भड़काऊ गतिविधियां देखने को मिलीं. लेकिन अब जिस तरह के बयान गोरखा रेजिमेंट को लेकर आ रहे हैं वो चिंता में डालने वाले हैं.

नेपाल के इस संगठन ने क्या कहा
नेपाल में प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल के नेता नेत्रा विक्रम चांद उर्फ बिप्लव ने कहा है कि नेपाल सरकार को सारे गोरखा सैनिकों को नेपाल में ही रोक लेना चाहिए. उन्हें भारत नहीं जाने देना चाहिए. दरअसल छुट्टी पर नेपाल गए गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों से भारतीय सेना इस नाजुक स्थिति में छुट्टियां रद्द करके वापस आने के लिए कहा था.

हाल ही में एक मार्च पास्ट के दौरान शपथ लेती गोरखा रेजिमेंट

क्या नेपाल सरकार के इशारों पर दे रहे हैं ऐसा बयान
माना जाता है कि बिप्लव नेपाल सरकार के इशारों पर ऐसे बयान दे रहे हैं. क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल के तार अब सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हैं. बिप्लव ये भी कहते हैं कि ऐसा लग रहा है कि भारत गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों को चीन के खिलाफ सीमा पर तैनात करेगा, जो इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि फिर हमारे देश के गोरखाओं का इस्तेमाल चीन के खिलाफ होगा, जो हमारा मित्र देश है. भारत को ऐसा करने से रोका जाना चाहिए.

नेपाल के अखबार काठमांडू पोस्ट ने क्या लिखा
नेपाल के प्रमुख “काठमांडू पोस्ट” ने एक दिन पहले एक रिपोर्ट छापी, जिसमें थिंक टैंक माने वाले त्रिभुवन यूनिवर्सििटी के मृगेंद्र बहादुर कर्की कहते हैं, भारत गोरखा सैनिकों के महत्व को जानता है इसलिए उसने नेपाल से सीमा विवाद को लेकर हल्का रुख अपनाया हुआ है.

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हालांकि उनका ये भी कहना है कि नेपाल को खुद भी टकराव की स्थिति से बचना चाहिए. नेपाल के सैनिक नेपाल की ओर से लड़ें वो भारत की सेना का अंग क्यों बने हुए हैं.

नेपाल के  विदेश मंत्री का सुर भी कुछ ऐसा ही
नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप गियावली ने कहा, जिस तरह से भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ रहा है, उसके बीच हम गोरखा सैनिकों को लेकर चिंतित हैं. हमें ये पता लगा है कि उनकी तैनाती चीन सीमा पर की जाने वाली है. कुछ ऐसा ही बयान नेपाल के रक्षा मंत्री की ओर से आया.

200 सालों से गोरखा रेजिमेंट से है भारत का नाता
1815 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी का युद्ध नेपाल राजशाही से हुआ था, तब नेपाल को हार का मुंह देखना पड़ा था लेकिन नेपाल के गोरखा सैनिक बहुत बहादुरी से लड़े थे. उनकी इस बहादुरी ने खुद अंग्रेजों को प्रभावित किया.

भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की बहादुरी और आक्रमकता की मिसाल दी जाती है

इसके बाद जब 1816 में अंग्रेजों और नेपाल राजशाही के बीच सौनोली संधि हुई तो ये तय हुआ कि ईस्ट इंडिया कंपनी में एक गोरखा रेजिमेंट बनाई जाएगी, जिसमें गोरखा सैनिक होंगे. तब से लेकर अब तक गोरखा भारतीय फौजों का अनिवार्य हिस्सा बने हुए हैं. उनकी बहादुरी के किस्से लगातार कहे और सुने जाते हैं. गोरखा रेजिमेंट का कुछ हिस्सा ब्रिटेन की सेना में भी शामिल हुआ. अब भी ब्रिटिश सेना में गोरखा रेजिमेंट एक अहम अंग है.

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1947 में जब भारत आजाद हो रहा था तब भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसके तहत छह गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना में स्थानांतरित कर दी गईं. बाद में एक सातवीं रेजीमेंट और बनाई गईं. तब ये सातों गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना में अपना झंडा गाड़े हुए हैं.

गोरखा रेजिमेंट ने कई बड़ी लड़ाइयां लड़ी हैं
गोरखा रेजिमेंट में भारत में अपने 200 सालों के इतिहास में ना केवल कई बड़ी लड़ाइयां लड़ी हैं बल्कि अपनी बहादुरी का परिचय भी दिया है. इसमें इस रेजिमेंट के सैनिकों को पहले और दूसरे विश्व युद्ध में बाहर भेजा गया. इसके अलावा भारत ने जो भी बड़ी लडा़इयां या अभियानों में शिरकत किया, उसमें गोरखा सैनिक हिस्सा लेते रहे हैं. भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों को सबसे आक्रामक और दुस्साहसी माना जाता रहा है. उन्हें बहादुरी के लिए बहुत से मेडल और सम्मान मिल चुके हैं.

कहां – कहां हैं गोरखा रेजिमेंट सेंटर
भारत में कई शहरों में गोरखा रेजिमेंट के सेंटर हैं. चार बड़े शहरों में उनके ट्रेनिंग सेंटर भी हैं. इसमें वाराणसी, लखनऊ, हिमाचल प्रदेश में सुबातु, शिलांग शामिल हैं. तमाम मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गोरखा सैनिकों की करीब 39 बटालियन में 32,000 सैनिक हैं. गोरखा रेजिमेंट को आमतौर पर पर्वतीय इलाकों में लड़ाई का विशेषज्ञ माना जाता है. गोरखपुर में गोरखा रेजिमेंट की भर्ती का बड़ा केंद्र है.

क्या कहते थे जनरल मानेकशॉ
भारत के पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल‘सैम मानेकशॉ अक्सर कहते थे अगर कोई आदमी यह कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता या तो वह झूठ बोल रहा होता है या फिर वह “गोरखा” है. मानेकशॉ खुद भी गोरखा रेजिमेंट से ही थे. इस रेजिमेंट को दुश्मनों के लिए काल भी जाता है. युद्ध में अपनी बहादुरी और अक्रामकता के लिए पहचाने जाने वाले ‘गोरखा’ भारतीय सेना के सबसे बेहतरीन सैनिकों में से एक माने जाते हैं.

‘खुकरी’ गोरखा सैनिकों की पहचान
भारतीय सेना में हर रेजिमेंट की एक खास पहचान है. कुमांऊ रेजिमेंट की पहचान ‘शेर’ का सिंबल है तो डोगरा रजिमेंट की पहचान चीता. ठीक वैसे ही गोरखा रेजिमेंट की पहचान 12 इंच लंबी और मुड़ी हुई ‘खुकरी‘ से होती है. यह खुकरी का सिंबल अधिकारी से लेकर सैनिकों तक की वर्दी के कंधों और सेना की टोपी पर बना होता है. आइएमए’ में ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जब आर्मी ऑफिसर को गोरखा रेजिमेंट में भेजा जाता है, तब उन्हें वहां ‘खुकरी’ जरुर दी जाती है.



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