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राजस्थान: सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच विवाद की वजह क्या है?

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच जारी सियासी खींचतान की जड़ें 2018 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी हुई हैं. कांग्रेस के चुनाव जीतने के साथ ही पायलट और गहलोत दोनों मुख्यमंत्री पद के मज़बूत दावेदार थे.

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली/जयपुर: राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट एक दूसरे के सामने आ गए हैं जिसमें पायलट ने गहलोत सरकार को अल्पमत में बताते हुए 30 विधायकों के समर्थन का दावा किया है.

वहीं, कांग्रेस महासचिव और राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडे ने रविवार देर रात 2:30 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गहलोत के साथ 109 विधायकों के समर्थन का दावा किया.

दरअसल, गहलोत और पायलट के बीच इस खींचतान की जड़ें 2018 के विधानसभा चुनाव से जुड़ी हुई हैं.

दिसंबर 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव जीतने के साथ ही पायलट और गहलोत दोनों मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार थे.

पायलट के समर्थकों का दावा था कि प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष होने के कारण मुख्यमंत्री के पद पर उनका पहला अधिकार था.

चुनाव के दौरान मीडिया द्वारा पायलट को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश किए जाने के दौरान गहलोत इस पर अपनी मिलीजुली प्रतिक्रिया देते थे.

एक मौके पर उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर पायलट के मुख्यमंत्री बनने की बात कही थी, जबकि दूसरे मौके पर उन्होंने कहा था कि सभी प्रदेश अध्यक्ष मुख्यमंत्री नहीं बनते हैं.

एक बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए मुख्यमंत्री बनने वाले गहलोत ने कहा था कि यह केवल अपवाद है. उस दौरान गहलोत कांग्रेस महासचिव (संगठन) होने के बावजूद उन्होंने अपनी राष्ट्रीय भूमिका के बजाय क्षेत्रीय भूमिका को अधिक महत्व दिया था.

2018 के विधानसभा चुनाव में जीतकर आए अधिकतर विधायक गहलोत कैंप के थे, जिसके कारण राज्य में राजनीतिक समीकरण बदल गए और पार्टी आलाकमान ने उनके मुख्यमंत्री बनने को मंजूरी दे दी.

हालांकि, कांग्रेस के सूत्रों ने द वायर   से कहा था कि पायलट से महत्वाकांक्षाओं को कम करते हुए उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए रखने का वादा किया गया था. इस तरह से वे पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रख सकते थे और उन्हें उप-मुख्यमंत्री भी बनाया गया.

हालांकि, कुछ दिन बाद ही गहलोत ने गृह और वित्त दो महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रख लिए और लोक निर्माण विभाग जैसे कम महत्वपूर्ण विभाग पायलट को दे दिए.

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी राज्य की सभी 25 संसदीय सीटें हार गई थी. इसके बाद गहलोत ने पार्टी और खासकर जोधपुर से अपने बेटे वैभव की हार के लिए प्रदेश अध्यक्ष पायलट को ठहराया था.

उसके बाद से ही राजस्थान में राजनीतिक विश्लेषकों ने मानना शुरू कर दिया था कि गहलोत, पायलट को राज्य की राजनीति में किनारे करना चाहते हैं.

जोधपुर स्थित एक राजनेता ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा, ‘गहलोत के पास अनुभव है. वे सभी को साथ लेकर चलते हैं और खुद एक गैरप्रभावी समुदाय से आने के कारण सभी जाति समूहों को पार्टी में पद के रूप में प्रतिनिधित्व देते हैं. इसके साथ ही वे ऐसे लोगों को माफ नहीं करते हैं, जो उन्हें चुनौती देते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘हाल के समय में उनके लिए चुनौती पेश करने वाले गिरीजा व्यास और सीपी जोशी राजनीतिक तौर पर खत्म हो चुके हैं. गहलोत को उनके राजनीतिक पतन का प्राथमिक कारण माना जाता है. ऐसी स्थिति है कि पिछले विधानसभा चुनावों में एक बार के राष्ट्रीय नेता और केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी अपने गृह क्षेत्र नाथद्वारा में विधायक सीट भी नहीं जीत सके थे. व्यास का भी यही हाल हुआ और वह विधानसभा चुनाव में उदयपुर सीट से हार गईं. ये दोनों नेता गहलोत के दावेदार के रूप में उभरे और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ इनका विशेष तालमेल था.’

राजस्थान में पिछले कुछ दिनों में जिस तरह की परिस्थिति पैदा हुई है उसमें इसी तरह की लड़ाई दिखी है. इस बार भी राज्य के राजनीतिक समीकरणों पर गहरी पकड़ रखने वाले गहलोत ने सख्त रवैया अपनाया हुआ है.

हालांकि, पहले की तरह इस बार की लड़ाई गहलोत के लिए आसान नहीं रहने वाली है, क्योंकि पायलट न केवल युवाओं में एक लोकप्रिय चेहरा हैं बल्कि गुज्जर समुदाय के वोटरों में गहरी पैठ रखते हैं.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)



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