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हार्दिक को केवल पाटीदार नेता होने के नाते नहीं बल्कि उनकी क्षमता के मद्देनजर अध्यक्ष बनाया है

हार्दिक पटेल को शनिवार को गुजरात कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नामित किया गया। फाइल फोटो: एएनआई


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अहमदाबाद: कांग्रेस का शनिवार को हार्दिक पटेल को गुजरात कांग्रेस इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फैसला, एक ऐसा क़दम है जो उनकी पाटीदार जाति की पहचान से आगे जाता है. 27 वर्षीय पटेल सिर्फ पाटीदार हितों के एक तेज़-तर्रार वक्ता ही नहीं हैं. बल्कि उन मुद्दों की भी बात करते हैं. जिनका सरोकार नौजवानों, किसानों और छोटे कारोबारियों से है और जिसकी व्यापक गूंज गुजरात के सभी वर्गों और जातियों के लोगों में सुनाई पड़ती है.

कांग्रेस के फैसले के पीछे एक पहलू मज़बूत लीडरशिप की कमी है, जो इस बात से दिखाई पड़ती है कि पार्टी के मुख्यमंत्री पद के तीन अभिलाषी-शक्ति सिंह गोहिल, अरुण मोधवाडिया और सिद्धार्थ पटेल- 2017 के पिछले विधानसभा चुनावों में ख़ुद अपनी सीटें हार गए. हालांकि पार्टी ने बीजेपी को दो दशकों में सबसे कड़ी टक्कर दी थी.

शनिवार रात अपनी नियुक्ति के बाद, हार्दिक पटेल ने दिप्रिंट से कहा कि ऐलान होने से पहले तक उन्हें अपने प्रमोशन का पता नहीं था. अपनी योजनाओं के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘मैं वही करूंगा, जो अब तक करता रह हूं- लोगों तक पहुंचना.’

2017 से क्या हासिल हुआ

2017 के चुनावों में कांग्रेस ने लोगों की उम्मीदों से बढ़कर प्रदर्शन किया. ये देखते हुए कि गुजरात बीजेपी का गढ़ है, जो 1998 से निरंतर सत्ता में बनी हुई है और जिसकी अगुवाई लगभग 13 साल- 2001 से 2014 तक नरेंद्र मोदी ने की, जो अब प्रधानमंत्री हैं.

182 सदस्यीय सदन में अंतिम टैली, 99-81 के अनुपात से बीजेपी के पक्ष में थी, लेकिन इसने कांग्रेस के फिर से उभरने के संकेत दे दिए.

विपक्ष के पास सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ प्रचार के लिए मुख्य रूप से तीन नौजवान नेता थे- एक उच्च जाति के पाटीदार , पटेल, एक दलित अल्पेश ठाकुर और जिग्नेश मेवानी. इन तीन नेताओं में सिर्फ ठाकुर कांग्रेस के सदस्य थे, जिन्होंने राधनपुर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. मेवानी वडगाम से जीतकर विजयी हुए. लेकिन निर्दलीय के नाते, जिसने कांग्रेस के साथ मंच साझा किया. पटेल की उम्र उस समय कम थी और वो चुनाव नहीं लड़ सकते थे.

2017 चुनावों के बाद से

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पहले से बेहतर प्रदर्शन किया. लेकिन वो फिर भी हार गई. जिससे हार्दिक पटेल के रथ का पहिया ठहर गया. उसके बाद पाटीदार आरक्षण आंदोलन को फिर से खड़ा करने के उनके प्रयास ज़्यादा कामयाब नहीं हुए, हालांकि वो दावा करते हैं कि ग़ैर-आरक्षित वर्गों के लिए आर्थिक आरक्षण और गुजरात सरकार की ओर से पाटिदारों और अन्य के लिए स्पेशल परपज़ वेहिकल का गठन, ‘पाटिदार आंदोलन के ही फल थे.’


यह भी पढ़ें : साधारण किसान परिवार में जन्मे हार्दिक पटेल राज्य में प्रतिरोध का चेहरा बनकर उभरे


2019 लोकसभा चुनावों से पहले पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए और वो सब मुद्दे जो युवा नेताओं ने उठाए थे- बेरोज़गारी और नोटबंदी तथा जीएसटी के दुष्प्रभाव, क्रोनी कैपिटलिज़्म के आरोप, शिक्षा और स्वास्थ्य सेक्टर्स का बढ़ता निजीकरण- तब भी प्रासंगिक थे. लेकिन वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे और अपने गृह राज्य में मोदी की एक और आंधी ने कांग्रेस का सभी सीटों पर सफाया कर दिया, जिसमें जीत का कम से कम अंतर 1.5 लाख वोट था और 13 बीजेपी सांसद तीन लाख से अधिक वोटों से विजयी हुए.

इस बीच ठाकुर कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे, लोकिन वो अपनी सीट पर उप-चुनाव नहीं जीत पाए.

उसके बाद से ऐसा लगता है कांग्रेस फिर से निष्क्रियता और निराशा के भाव में वापस आ गई है- आठ विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं. जिनमें से पांच बीजेपी में चले गए जिसके उसके तीन उम्मीदवारों के राज्यसभा सीटें जीतने का रास्ता साफ हो गया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने अभी तक कुछ ख़ास नहीं किया है और न ही नेता विपक्ष परेश धनानी ने किया है.

लेकिन हार्दिक पटेल लगातार सक्रिय हैं, कोविड-19 का प्रकोप रोकने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन से पहले तक वो ज़िलों और गांवों का दौरा कर रहे थे और लोगों से मिलकर बैठकें कर रहे थे. जनवरी में दो प्रमुख जनसभाएं हुईं- एक अमित चावड़ा के चुनाव क्षेत्र अंकलाव में हुई. इसमें उन्हें बेरोज़गारी और किसानों की आत्महत्याओं के मुद्दों पर युवाओं और किसानों को संबोधित करते देखा गया जहां वो कोई नोट्स देखे बिना आंकड़े दे रहे थे. दूसरी सभा खेड़ा में थी जिसमें संथानीय संगठनों ने पाटिदार हितों में योगदान के लिए उनका सम्मान किया.

अब, अनलॉक के दौर में पिछले हफ्ते वो मोरबी गए, जहां आगामी उप-चुनावों में सही उम्मीदवार चुनने के लिए उन्होंने अपने से तीन गुना उम्र के नेताओं से मुलाक़ात की.

भविष्य पर निगाह

गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के नाते पटेल को पता है कि उन्हें क्या करना है. विधानसभा की आठ सीटों के उप-चुनाव किसी भी समय घोषित हो सकते हैं, जबकि स्थानीय निकायों के चुनाव इस साल के अंत में होने हैं.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस के पास गुजरात में खोने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है. इसलिए इस प्रयोग को समझा जा सकता है.

राजनीति विज्ञानी विद्युत जोशी का कहना है, ‘गुजरात में जहां कांग्रेस मरणासन्न अवस्था में है. उसे युवा, आक्रामक और ऊर्जावान नेता चाहिएं. हार्दिक के साथ पार्टी फायदे में रहेगी, क्योंकि वो न केवल पाटीदार नेता हैं. बल्कि एक युवा व्यक्ति हैं जो जन आंदोलनों को खड़ा करके चला सकते हैं.’

जोशी ने कहा, ‘गुजरात में बहुत सारी समस्याएं हैं, लेकिन कांग्रेस के अंदर उनका फायदा उठाने की ऊर्जा या ड्राइव नहीं है. ये युवक वो काम कर सकता है और ज़्यादा से ज़्यादा नौजवानों को अपने साथ जोड़ सकता है. फिलहाल तो ये एक अच्छा फैसला है. ये सब इस बार पर निर्भर करता है कि कांग्रेस इसका फायदा कैसे उठाती है और अन्य सीनियर नेताओं को कैसे हैण्डल करती है.’

राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार हरि देसाई ने भी इसे एक ‘स्वागत योग्य’ क़दम क़रार दिया.

देसाई ने कहा, ‘पाटीदार पहलू को भूल जाईए, कांग्रेस के लिए ज़्यादा ज़रूरी ये है कि उसके पास युवा और स्मार्ट नेता हों और इस आदमी के अंदर इतनी हिम्मत है कि ये वापसी कर सकता है. ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लोगों के बीच इसकी पकड़, कथित रूप से सीनियर लीडर्स की अपेक्षा कहीं अधिक है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘उन्हें लाने के पीछे एक कारण, ये सुनिश्चित करना भी हो सकता है, कि वो आम आदमी पार्टी में नचले जाएं.’

(लेखक डेवलपमेंट समाचार नेटवर्क, गुजरात में संपादक हैं)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )




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