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Covid-19 के खिलाफ क्या है वो ‘धारावी मॉडल’, जिसे WHO ने माना मिसाल

कोरोना Viral Infection से सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य Maharashtra रहा और यहां सबसे बड़ा Hot-Spot मुंबई. एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में अप्रैल में जब कुल कन्फर्म केस 400 का आंकड़ा पार कर रहे थे, तब भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में चिंता का माहौल था क्योंकि 2.5 वर्ग किलोमीटर में फैले इस स्लम में करीब दस लाख (A Million) लोग रहते हैं. यहां संक्रमण फैलने पर काबू पाना वाकई बेहद मुश्किल काम था, लेकिन दो महीने में लगातार कोशिशों से ये मुमकिन हुआ.

हाल में, विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख ने अपने वक्तव्य में वियतनाम, कंबोडिया व अन्य स्थानों के साथ ही धारावी के उस मॉडल की भरपूर तारीफ की, जो कोविड 19 से लड़ने में कारगर साबित हुए. WHO ने माना कि धारावी जैसी घनी बस्ती में वायरस की चेन को तोड़ा जाना वाकई बड़ा काम रहा. जानिए​ कि धारावी ने ये कारनामा कैसे अंजाम दिया.

एक नज़र में धारावी मॉडल
बीते रविवार को धारावी में कुल केसों की संख्या 2370 तक पहुंच चुकी थी और मौतों की संख्या 200 से ज़्यादा थी. लेकिन, कामयाबी की कहानी इन आंकड़ों में है. अप्रैल में यहां रिकवरी रेट 33 फीसदी था, जो मई में 43, जून में 49 और जुलाई में 74 फीसदी रहा. केसों के दोगुने होने की दर अप्रैल में 18 दिन थी, मई में 43, जून में 108 और जुलाई में अनुमानित 430 दिनों की हो गई है. ये आंकड़े कैसे संभव हुए, कुछ बिंदुओं में साफ हो जाता है.1. फॉर्मूला 4-T ने किया कमाल

धारावी में वायरस संक्रमण फैलने के बाद सख्त कदम उठाए गए और जगह जगह न केवल कोविड सेंटर खोले गए बल्कि स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की टीम ने डोर टू डोर निगरानी की. इससे हुआ ये कि ज़्यादा से ज़्यादा ट्रैसिंग, ट्रैकिंग, टेस्टिंग और ट्रीटमेंट के फॉर्मूले पर ज़ोर दिया गया, जिससे हालात काबू में लाने में काफी मदद मिली.

धारावी में बीएमसी ने डीडब्ल्यूबी, प्राइवेट और सरकारी स्वास्थ्यकर्ताओं की टीम के साथ मिलकर रणनीति बनाई.

2. पी-पी-पी सिस्टम हुआ हिट
फीवर क्लीनिकों या कैंपों की मदद से मरीज़ों की पहचान बहुत शुरूआती स्टेज पर की जा सकी. हाई रिस्क ज़ोन में मरीज़ों को पहचानने के लिए डोर टू डोर जाने के लिए पब्लिक-प्राइवेट-पैक्ट की रणनीति रंग लाई. बीएमसी ने 24 प्राइवेट डॉक्टरों को इस मैदान में उतारा और उन्हें पीपीई किट के साथ ही थर्मल स्कैनर, पल्स मीटर, मास्क, दस्ताने जैसे तमाम उपकरण मुहैया कराए और कई वॉलेंटियर भी.

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3. कंटेनमेंट के लिए सख्ती
धारावी में संक्रमण पर काबू पाने के लिए सख्त लॉकडाउन और कंटेनमेंट की नीति अपनाई गई. प्रशासन ने जहां फूड पैकेट बांटे और सुनिश्चित किया कि लोग बगैर काम के बाहर न​ निकलें, वहीं WHO ने माना कि धारावी में सेल्फ डिसिप्लीन और सामुदायिक स्तरों पर हुई कोशिशों ने बहुत बड़ी जंग जीतने में अहम भूमिका निभाई.

4. हेल्थकेयर ढांचा किया गया मज़बूत
धारावी जैसे घने स्लम में पिछड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं को विस्तार देने के लिए सरकार के साथ ही प्राइवेट अस्पताल भी आगे आए और इलाज के लिए मदद दी. इसके अलावा, यहां आइसोलेशन और क्वारंटाइन के लिए कई केंद्र भी पब्लिक प्राइवेट सहयोग के ज़रिये बनाए गए. दावों की मानें तो यह सब बहुत आक्रामक ढंग से और प्रत्याशित से भी बड़े पैमाने पर किया गया.

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5. चुनौतियां और केरल से प्रेरणा
धारावी चूंकि बहुत घनी और गरीब लोगों की बस्ती है इसलिए यहां ज़्यादातर लोग सामुदायिक टॉयलेट इस्तेमाल करते हैं. यहां साफ सफाई का खयाल रख पाना बहुत बड़ी चुनौती था, जिसे फेस करने का बीड़ा बीएमसी ने उठाया और लगातार सैनिटाइज़ेशन करने का दावा किया गया. दूसरी तरफ, कोविड संघर्ष के केरल के मॉडल से महाराष्ट्र ने लाभ उठाया.

महाराष्ट्र ने केरल की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा से संपर्क किया और उन्होंने तमाम सावधानियों व प्रोटोकॉल के बारे में महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री को जानकारियां दीं. इसे धारावी में पूरी शिद्दत के साथ लागू किया गया. इसके साथ ही, डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की टीमों, कई वॉलेंटियरों और पब्लिक प्राइवेट साझेदारी से धारावी में कोविड के खिलाफ जंग जीतने में बड़ी मदद मिली. 1 अप्रैल को जब पहला केस धारावी में पाया गया था, तबसे बीती 7 जुलाई को पहली बार हुआ कि यहां एक दिन में सिर्फ 1 केस सामने आया.



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