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सिविल सेवा परीक्षा में ऋचा ने हिंदी माध्यम से पाई सफलता

ऋचा रत्नम

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सिविल सेवा परीक्षा में ऋचा ने हिंदी माध्यम से पाई सफलता
नोएडा। देश की सबसे बड़ी सिविल सेवा परीक्षा में कोई यह कहे कि हमने हिंदी माध्यम से सफलता पाई है तो थोड़ा अटपटा जरूर लगेगा, लेकिन नोएडा सेक्टर-51 में रहने वाली ऋचा रत्नम ने ऐसा ही करके दिखाया है। उन्होंने हिंदी में परीक्षा देकर 274वीं रैंक हासिल की है। ऐसा नहीं कि अंग्रेजी में उनकी पकड़ नहीं है, लेकिन उन्हें विश्वास था कि जो बात मैं हिंदी में लिखूंगी तो उसका प्रभाव अंग्रेजी की अपेक्षा ज्यादा होगा।
अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर बातचीत के दौरान ऋचा ने बताया कि दादा शंभू श्रीवास्तव (स्वर्गीय) व पिता शैलेंद्र श्रीवास्तव प्रोफेसर रहे हैं। तीन पीढ़ियों से परिवार में हिंदी का माहौल रहा है। बातचीत, पढ़ने और लिखने के दौरान दिमाग में शुरू से ही यह धारणा रही कि मैं हिंदी में ज्यादा बेहतर कर सकती हूं। अटूट विश्वास ने ही मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया है। ऋचा ने बताया कि हिंदी में तैयारी के दौरान कुछ दिक्कतें भी आईं। उसका कारण है कि अंग्रेजी की अपेक्षा हिंदी में प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें कम हैं। हिंदी का साहित्य एकत्र करने में दिक्कत भी आती है। मसलन, लोकसभा व राज्यसभा की कार्यवाही अंग्रेजी में आसानी से मिल जाएगी। हिंदी में भी मिलेगी, लेकिन कई शब्द ऐसे होंगे, जो कभी-कभी समझ में नहीं आते हैं। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि परीक्षाओं में भाषा आप जो भी चुनें, उस पर आपकी पकड़ अच्छी होनी चाहिए। आप किसी भी भाषा में तैयारी करें, लेकिन अंग्रेजी ही नहीं अन्य जो ही भाषाएं आपको आती हैं, उनका साहित्य भी पढ़ें। जब आपको अच्छा ज्ञान होगा, तभी आप किसी भी विषय पर अच्छा बोल और लिख पाएंगे।

सिविल सेवा परीक्षा में ऋचा ने हिंदी माध्यम से पाई सफलता

नोएडा। देश की सबसे बड़ी सिविल सेवा परीक्षा में कोई यह कहे कि हमने हिंदी माध्यम से सफलता पाई है तो थोड़ा अटपटा जरूर लगेगा, लेकिन नोएडा सेक्टर-51 में रहने वाली ऋचा रत्नम ने ऐसा ही करके दिखाया है। उन्होंने हिंदी में परीक्षा देकर 274वीं रैंक हासिल की है। ऐसा नहीं कि अंग्रेजी में उनकी पकड़ नहीं है, लेकिन उन्हें विश्वास था कि जो बात मैं हिंदी में लिखूंगी तो उसका प्रभाव अंग्रेजी की अपेक्षा ज्यादा होगा।

अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस पर बातचीत के दौरान ऋचा ने बताया कि दादा शंभू श्रीवास्तव (स्वर्गीय) व पिता शैलेंद्र श्रीवास्तव प्रोफेसर रहे हैं। तीन पीढ़ियों से परिवार में हिंदी का माहौल रहा है। बातचीत, पढ़ने और लिखने के दौरान दिमाग में शुरू से ही यह धारणा रही कि मैं हिंदी में ज्यादा बेहतर कर सकती हूं। अटूट विश्वास ने ही मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया है। ऋचा ने बताया कि हिंदी में तैयारी के दौरान कुछ दिक्कतें भी आईं। उसका कारण है कि अंग्रेजी की अपेक्षा हिंदी में प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें कम हैं। हिंदी का साहित्य एकत्र करने में दिक्कत भी आती है। मसलन, लोकसभा व राज्यसभा की कार्यवाही अंग्रेजी में आसानी से मिल जाएगी। हिंदी में भी मिलेगी, लेकिन कई शब्द ऐसे होंगे, जो कभी-कभी समझ में नहीं आते हैं। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि परीक्षाओं में भाषा आप जो भी चुनें, उस पर आपकी पकड़ अच्छी होनी चाहिए। आप किसी भी भाषा में तैयारी करें, लेकिन अंग्रेजी ही नहीं अन्य जो ही भाषाएं आपको आती हैं, उनका साहित्य भी पढ़ें। जब आपको अच्छा ज्ञान होगा, तभी आप किसी भी विषय पर अच्छा बोल और लिख पाएंगे।

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