Home राज्यवार बिहार अब कहां नसीब होगी 'राहत की शायरी'

अब कहां नसीब होगी ‘राहत की शायरी’

Publish Date:Wed, 12 Aug 2020 08:43 AM (IST)

कुमार रजत, पटना । गर्मी की ढलती शामें जब रात से मिलतीं तो इसी शहर में ‘राहत का जादू’ चलता था। शायर राहत इंदौरी का जादू। अमूमन राहत साहब की गर्मी बिहार में ही गुजरती। हर साल मई-जून में होने वाले जागरण कवि सम्मेलन की श्रृंखला में शिरकत के लिए वह लंबे समय तक बिहार में रहते। सिर्फ पटना ही नहीं, आरा, बक्सर, हाजीपुर, जहानाबाद, गोपालगंज जैसे शहरों की अनगिनत शामें राहत की शायरी की गवाह बनीं।

वर्ष 2017 में 27 मई का दिन ऐसा ही था। शाम में राजधानी के भारतीय नृत्य कला मंदिर के मुक्ताकाश मंच पर राहत साहब का कार्यक्रम था। इससे पहले वे दोपहर में होटल के कमरे में आराम कर रहे थे। अखबार के इंटरव्यू के लिए हम उनके कमरे में दाखिल हुए। वे जागरण के कवि सम्मेलनों की परंपरा के मुरीद थे। कहते, जागरण ने अदब की महफिल को बड़े शहरों से निकाल गांव-कस्बों तक पहुंचा दिया। बातचीत अभी शुरू ही हुई थी कि वेटर खाना लेकर आ गया। खाना टेबल पर रखा देखकर बोले- पहले खाना खाया जाए, बातचीत भी साथ में होती रहेगी। खाने को इंतजार नहीं कराते। हमें भी खाने पर बिठा लिया। चार रोटी में दो खुद ली और दो दे दी। बोले-साथ खाने से मोहब्बत बढ़ती है। ऐसे भी दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। इतना बड़ा नाम होकर भी वे सहज और सरल थे।

जागरण कवि सम्मेलन के संयोजक, प्रसिद्ध कवि व संचालक डॉ. सुरेश अवस्थी कहते हैं- कवि सम्मेलनों के मंच के वे सुपरस्टार थे। पटना और अन्य बड़े शहर ही नहीं, सुदूर ग्रामीण इलाकों में भी उनके कद्रदान थे। वे अंत में पढ़ते और सुनने वाले आधी रात तक इंतजार करते। इस साल फरवरी में उन्होंने आखिरी बार जागरण समूह के नई दुनिया के कवि सम्मेलन में शिरकत की थी।

मशहूर शायर कासिम खुर्शीद कहते हैं, ‘राहत इंदौरी मुशायरे की कामयाबी की जमानत माने जाते थे। बीच के दौर में मुशायरों में भीड़ की एकमात्र वजह राहत साहब की शायरी थी। ये भी संयोग है कि लॉकडाउन से ठीक पहले मार्च में बिहार का आखिरी मुशायरा उन्होंने शेखपुरा में पढ़ा जिसकी निजामत मैंने ही की थी।’

शायर समीर परिमल भी उन्हें शेखपुरा के मुशायरे के हवाले से याद करते हुए कहते हैं कि इस आयोजन में उनके बेटे सतलज राहत भी साथ थे। एक दिन पहले गोपालगंज में भी मुशायरा था जो नाव दुर्घटना के कारण टल गया था। इसके बाद वे कार से ही सफर कर शेखपुरा पहुंचे। थकावट के बावजूद मंच पर उनकी ऊर्जा देखने लायक थी। जनता में जैसी दीवानगी उनको लेकर थी, वैसी बहुत कम को नसीब होती है। उनकी जगह लंबे समय तक खाली रहेगी।

Posted By: Jagran

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