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प्रशांत भूषण के लिए बोलने वाले लोग जस्टिस कर्णन के मामले में चुप क्यों थे

प्रशांत भूषण | फेसबुक


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जनहित याचिकाओं और भ्रष्टाचार विरोधी केसों को लड़ने के लिए मशहूर वकील प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना यानि कंटेप्ट ऑफ कोर्ट के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी पाए जाने के बाद से ही भद्र समाज के एक हिस्से में बवाल मचा हुआ है. लोकतांत्रिक और उदारवादी लोग इस फैसले से काफी चिंतित हैं. हजारों वकीलों और कई जजों तथा बुद्धिजीवियों ने खुलकर इस फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाई है.

लेकिन तीन साल पहले जब कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस कर्णन के खिलाफ अदालत की अवमानना मामले में फैसला आया था और जस्टिस कर्णन को छह महीने के लिए जेल भेजा गया था तो इन्हीं लोगों ने चुप रहना चुना था.

जस्टिस कर्णन भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के पहले जज हैं जिन्हें पद पर रहते हुए जेल की सजा हुई.

प्रशांत भूषण मामले में हंगामा और जस्टिस कर्णन मामले में चुप्पी के बीच फर्क इतना ज्यादा है कि उसे अलग से बताने की भी जरूरत नहीं है. मैं ये नहीं कह रहा हूं कि ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ कि जस्टिस कर्णन दलित और प्रशांत भूषण सवर्ण हैं. ये पूरे मामले का सरलीकरण होगा जबकि मामला इतना सीधा भी नहीं है.

प्रशांत भूषण इलीट यानी भद्रलोक जमात के सदस्य हैं और उन्होंने जो सवाल उठाए हैं, उससे व्यवस्था यानि सिस्टम पर कोई सवाल नहीं उठता. वहीं, जस्टिस कर्णन भद्रलोक जमात के लिए बाहरी या अतिक्रमणकारी हैं और उनके सवाल भी पूरी व्यवस्था के खिलाफ थे और व्यवस्था को संदेह के दायरे में ला रहे थे.

इन दो मामलों को साथ रखकर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि वैचारिक विरोध के बावजूद भारत के इलीट, साझा हितों के लिए किस तरह एकताबद्ध रहते हैं.


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जस्टिस कर्णन का पक्ष लोकविमर्श में नहीं आया

प्रशांत भूषण और जस्टिस कर्णन दोनों के ही मामले कंटेप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट 1971 के तहत हैं. इस एक्ट में अधिकतम सजा छह महीने की जेल या/और 2000 रुपए का जुर्माना है. इस मायने में जस्टिस कर्णन को इस एक्ट के तहत अधिकतम सजा दी गई और अगर इसमें ज्यादा सजा का प्रावधान होता तो शायद उन्हें वही सजा मिलती.

जस्टिस कर्णन को छह महीने की जेल की सजा काटनी पड़ी और रिटायरमेंट के बाद उन्हें अपने पेंशन के लिए भी जूझना पड़ा. हालांकि उन्होंने संसद से लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी न्याय के लिए गुहार लगाई लेकिन हर मंच ने उन्हें निराश किया. किसी ने भी राहत देने की बात तो दूर उनकी शिकायतों को सुना भी नहीं. यहां तक कि उन्हें सजा सुनाए जाने से पहले उन्हें पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू नहीं की गई, जिस वजह से उन्हें हाई कोर्ट का जज रहते हुए जेल में रहना पड़ा.

इस लेख का उद्देश्य जस्टिस कर्णन केस के विस्तार और गुण-दोष में जाना नहीं है, फिर भी संक्षेप में जान लेते हैं कि ये क्या मामला था. बीबीसी की उस समय की रिपोर्ट के मुताबिक ‘ये विवाद जनवरी 2017 में शुरू हुआ, जब जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बताया कि 20 जज भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.’

यहां से उच्च न्यायपालिका और जस्टिस कर्णन के बीच आरोप-प्रत्यारोप और अदालती फैसलों की एक ऋंखला शुरू होती है जिसका अंत सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच द्वारा जस्टिस कर्णन को दोषी करार दिए जाने में होती है. बीबीसी की ही रिपोर्ट बताती है कि इस मामले में ‘सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को आदेश दिया कि जस्टिस कर्णन के बयानों को न छापें और न ही दिखाएं.’

इस फैसले के बाद मीडिया ने जस्टिस कर्णन का कोई बयान या पक्ष नहीं छापा इसलिए हम नहीं जानते कि जस्टिस कर्णन का पक्ष क्या है या पूरा मामला क्या है. उस वक्त कई पत्रकारों ने मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई पाबंदी का विरोध किया था.

अब विदेश मंत्रालय में नीतिगत सलाहकार के पद पर आसीन पत्रकार अशोक मलिक ने तब लिखा था कि– ‘अगर कोई अखबार जस्टिस कर्णन के पक्ष को छापता है तो क्या होगा? क्या सुप्रीम कोर्ट उस अखबार के संपादक और रिपोर्टर को जेल भेजेगा? किस कानून के तहत?’

अदालत की अवमानना कानून से भारत का खास लगाव

कंटेप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट औपनिवेशिक दौर का कानून है और इसे ब्रिटेन के कानून के अनुसार ही 1926 में बनाया गया था. इस कानून में बाद में कुछ बदलाव किए गए, हालांकि उसका मूल स्वरूप पहले जैसा बना रहा. अभी जो कानून लागू है, वह 1971 का संशोधित कानून है. दिलचस्प बात ये है कि जिस ब्रिटिश कानून की नकल में ये कानून बना है, उस ब्रिटेन में ये कानून समाप्त किया जा चुका है लेकिन भारत इस कानून से चिपका हुआ है.

लॉ कमीशन ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में इस कानून को बनाए रखने के पक्ष में दो तर्क दिए हैं. पहला तर्क ये है कि जहां ब्रिटेन में 1931 के बाद इस कानून के तहत कोई मामला दर्ज नहीं हुआ, वहीं भारत में रिपोर्ट को लिखे जाते समय लगभग एक लाख मामले इस एक्ट के तहत चल रहे थे. दूसरा तर्क ये है कि ब्रिटेन में हालांकि इस एक्ट को खत्म किया जा चुका है लेकिन दूसरे कानूनों के तहत ऐसे मामलों में फिर भी केस चल सकता है.

खुद प्रशांत भूषण को भी इस कानून से कोई शिकायत नहीं है. जस्टिस कर्णन को जब इस कानून के तहत 2017 में सजा हुई थी, तो प्रशांत भूषण ने ट्वीट कर इस फैसले पर खुशी जताई थी और जस्टिस कर्णन को भला-बुरा कहा था. यहां तक कि इस बारे में अपने ट्वीट में भूषण ने जस्टिस कर्णन के नाम के आगे जस्टिस शब्द भी नहीं लगाया जबकि वे उस समय हाई कोर्ट के जज थे.

मीडिया और ओपिनियन मेकर्स की चुप्पी

जस्टिस कर्णन को जब सजा हुई थी, तो भारत में मीडिया ने एकतरफा रुख अख्तियार कर लिया था. उस समय के अखबारों की रिपोर्ट, लेख और संपादकीय या फिर टीवी की बहस के आर्काइव पर सरसरी नज़र डालने से पता चलता है कि जस्टिस कर्णन के पक्ष को किसी ने भी नहीं रखा. कोई भी संपादकीय उनके पक्ष में नहीं लिखा गया. उनके पक्ष में उस समय सोशल मीडिया पर कोई अभियान भी नहीं चला.

मीडिया ने तो यहां तक खबर चलाई कि जस्टिस कर्णन संभवत: विदेश भाग गए हैं.

 

एकतरफा मीडिया कवरेज से जस्टिस कर्णन इतने दुखी हुए कि उन्होंने मीडिया को एक खुला पत्र लिखा और कहा कि– मैंने कई बार बताया है कि मैं जाति उत्पीड़न का शिकार हूं…यह दुर्भाग्यजनक और राष्ट्रीय आपदा है कि इस मुद्दे पर नेशनल मीडिया में कभी कोई चर्चा नहीं हुई.’ उन्होंने मीडिया से ईमानदार और निष्पक्ष हो कर काम करने की अपील की. जाहिर है कि उनकी बात सुनी नहीं गई.


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जस्टिस कर्णन मामले में चुप्पी का राज़

अगर दोनों केस की बात करें तो एक फर्क साफ है. जस्टिस कर्णन ने अपनी शिकायत प्रधानमंत्री को बंद लिफाफे में भेजी. यानी उन्होंने कोई सार्वजनिक आरोप नहीं लगाया था. जबकि प्रशांत भूषण का जज के मामले में ट्वीट, सोशल मीडिया पर यानि सार्वजनिक था.

इसके बावजूद जस्टिस कर्णन को मीडिया और ओपीनियन मेकर्स ने दोषी मान लिया जबकि प्रशांत भूषण के पक्ष में बोलने वाले हजारों प्रभावशाली लोग सामने आ गए हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ?

इस फर्क को समझने का एक सरल तरीका तो ये कहना है कि जस्टिस कर्णन दलित हैं, इसलिए सवर्ण समुदाय द्वारा संचालित मीडिया और विश्लेषकों, जो ज्यादातर सवर्ण हैं, ने उनके पक्ष की अनदेखी की. जबकि प्रशांत भूषण सवर्ण हैं और इलीट यानि भद्र समाज का हिस्सा हैं.

ये गौर करने की बात है कि प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण देश के कानून मंत्री रहे हैं और प्रशांत भूषण और शांति भूषण को इंडियन एक्सप्रेस ने 2009 में सबसे असरदार भारतीयों की लिस्ट में 75वें स्थान पर रखा था.

मैं कवरेज में पक्षपात के लिए जाति और इलीट होने या न होने के तर्क का न समर्थन कर रहा हूं और न ही विरोध. लेकिन सिर्फ इतने भर से मामले को समझा नहीं जा सकता है. मेरी राय में जस्टिस कर्णन और प्रशांत भूषण के आरोपों में भी फर्क है और शायद यही सबसे बड़ी वजह है जिसके कारण एक मामले में चुप्पी होती है और दूसरे मामले में शोर.

जस्टिस कर्णन किसी एक जज के व्यक्तिगत आचरण की बात नहीं कर रहे थे. उनके आरोपों के दायरे में पूरी न्यायपालिका और इस तरह पूरी सत्ता संरचना थी. उनके आरोप जातिवाद और भ्रष्टाचार से संबंधित थे. एक दलित जज सवर्णों के वर्चस्व वाली न्यायपालिका को जांच के दायरे में लाए, ये बहुत बड़ा अपराध माना गया और इसे अपराध मानने वाले सिर्फ वे सात जज नहीं थे जिन्होंने कर्णन के खिलाफ फैसला सुनाया बल्कि समाज के हर प्रभावशाली आदमी ने इसे अपराध माना.

भारतीय न्यायपालिका में सवर्ण वर्चस्व एक स्थापित तथ्य है जिसे सांसद करिया मुंडा की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्थापित किया है और इस बारे में काफी चर्चा हो चुकी है. इस कमेटी ने पाया था कि हाई कोर्ट के 481 जजों में से सिर्फ 15 दलित और 5 आदिवासी हैं. ये स्थिति अब भी बदली नहीं है.

जस्टिस कर्णन के आरोपों को सुना जाता तो न्यायपालिका की जातिवादी संरचना पर विवाद खड़ा हो सकता था. सत्ता संरचना ऐसा कतई नहीं चाहती है.


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कर्णन सबकी आंखों में क्यों खटकते हैं?

साथ ही न्यापालिका में भ्रष्टाचार के बारे में जस्टिस कर्णन के आरोपों ने भी सत्ता संरचना को असहज कर दिया था. हम नहीं जानते हैं कि अगर प्रधानमंत्री ने जस्टिस कर्णन के आरोपों वाली चिट्ठी को सुप्रीम कोर्ट में भेजने की जगह उस पर कोई जांच आयोग बिठाया होता या संयुक्त संसदीय समिति को ये मामला सुपुर्द कर दिया होता तो उसका नतीजा क्या होता.

जस्टिस कर्णन के आरोपों की तुलना में प्रशांत भूषण कोई बुनियादी सवाल नहीं उठा रहे थे. उनका ट्वीट एक व्यक्ति विशेष यानि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एस.ए. बोबडे द्वारा एक सुपरबाइक पर सवार होने को लेकर था. ये ज्यादा से ज्यादा व्यक्तिगत नैतिकता का मामला है.

इसलिए भूषण को सत्ता संरचना के एक हिस्से का समर्थन हासिल है. भूषण सत्ता संरचना का हिस्सा हैं. जस्टिस कर्णन सत्ता संरचना के लिए बाहरी व्यक्ति हैं. इसलिए उन्हें इलीट समुदाय, मीडिया और ओपीनियन मेकर्स के बीच कोई समर्थन नहीं मिला.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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