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जब मेहमान हुआ करती थी बिहार की बाढ़

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बिहार में बाढ़ का मौसम है। लगभग साढ़े पांच लाख लोगों को अपना गांव-घर छोड़ना पड़ा है। राज्य के उत्तरी हिस्से में लाखों लोग नदियों के तटबंधों और हाइवे पर झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं। कोरोना काल में इतनी बड़ी आबादी का यूं बेघर हो जाना कितनी बड़ी त्रासदी हो सकती है, इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। ख़ास तौर पर तब, जब इनमें से ज़्यादातर के पास व्यक्तिगत संसाधन के नाम पर लगभग कुछ नहीं है।

सबसे दुखद तथ्य यह है कि बिहार की बाढ़ कोई ऐसी आपदा नहीं, जो अचानक आई हो। राज्य में मॉनसून में बाढ़ आना एक रूटीन का रूप ले चुका है। साल 2008 में इन्हीं दिनों कोसी की भीषण त्रासदी हुई थी, जिसने दुनियाभर का ध्यान उत्तर बिहार की भीषण बाढ़ की तरफ खींचा। तब से 2020 तक शायद ही कोई ऐसा साल गुजरा हो, जब पानी ने तबाही नहीं मचाई।

राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के पोर्टल पर 1979 से लेकर अब तक के आंकड़े उपलब्ध हैं। वे भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि पिछले 41 बरसों में हर साल राज्य के बड़े इलाक़े बाढ़ से प्रभावित हुए। लोग बेघर हुए। मौतें हुईं और संपत्ति का ख़ासा नुकसान हुआ।

लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब बिहार में बाढ़ आपदा नहीं बल्कि मेहमान हुआ करती थी। उसके आने का इंतज़ार किया जाता। बाढ़ के साथ आने वाले पानी और उपजाऊ मिट्टी को संपदा समझा जाता था। बाढ़ तब भी तकरीबन हर साल आती, और जिस साल नहीं आती, उस साल आता भीषण सूखा। यह बहुत पुराने दौर की बात नहीं। मुश्किल से साठ-सत्तर साल पहले की बात है।

हां, तब बिहार की नदियां तटबंधों से घिरी नहीं थीं। तब बाढ़ इतनी विकराल नहीं हुआ करती थी कि लोगों को बेघर होना पड़े। वह आती थी चार दिन से लेकर दो हफ्ते के लिए। धीरे-धीरे पानी पसरता हुआ, पहले खेतों में घुसता, फिर घर के दरवाजे तक और बहुत हुआ तो आंगन तक पहुंचता। तब कुछ दिनों के इस कष्ट को काटने की लोगों के पास पूरी तैयार होती। घर का सामान पहले ही ऊंची जगहों पर रख लिया जाता। खाने-पीने की चीज़ें और जलावन का पहले से ही इंतजाम होता। पशुओं के चारे और उन्हें बाढ़ के पानी से बचाने की व्यवस्था होती।

इलाक़े के बुजुर्ग बताते हैं कि तब बाढ़ का आना एक उत्साह की बात होती। बच्चे पानी में दिनभर खेलते। युवा रात में नाव लेकर पानी में उतर जाते और झिझिया गाते। बाढ़ के साथ ढेर सारी मछलियां आतीं और इस क्षेत्र की आहार परंपरा को समृद्ध करतीं। फिर धीरे से किसी दिन पानी उतरने लगता। वापस नदी अपनी सीमा में बहने लगती। लेकिन अपने पीछे खेतों में ढेर सारी उपजाऊ मिट्टी छोड़कर चली जाती, जिसकी वजह से बिना जुताई, बिना खाद-पानी के खेतों में बंपर पैदावार होती।

इसी कारण 18वीं सदी के आख़िर और उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बड़ी संख्या में यूरोपियन किसान इस इलाक़े में बसे और उन्होंने यहां के जमींदारों से लीज पर जमीन लेकर नील, अफीम और गन्ने की कांट्रैक्ट फार्मिंग की शुरुआत की। खूब पैसा बनाया। तब लोग ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर यहां खेती करने आते थे।

यह सब बहुत स्वाभाविक था, क्योंकि उत्तर बिहार का इलाक़ा हमेशा से जल संपन्न माना जाता है। यहां की नदियों पर क़िताबें लिखने वाले हवलदार त्रिपाठी सहृदय ने लगभग 80 बड़ी और मझोली नदियों का ज़िक्र किया है, जो हिमालय से उतरकर लगभग 500 किमी की लंबाई में फैले इस पूरे इलाक़े को सिंचित करती हैं।

तब तालाब बचाते थे
पर्यावरण के मसले पर काम करने वाले लेखक सोपान जोशी कहते हैं, ‘इन नदियों का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि उत्तर बिहार की एक-एक इंच जमीन हिमालय को धोकर लायी गई मिट्टी से बना है। हिमालय से उतरने वाली यह सदाबहार नदियां, जो नेपाल सीमा पर बिहार में प्रवेश करती हैं और अंत में गंगा में मिल जाती हैं, किसी नेमत से कम नहीं। आंकड़े गवाह हैं कि इस इलाक़े में औसतन लगभग हर छह से सात किमी की दूरी पर कोई न कोई नदी बहती रही है।

बिहार के जल संसाधन विभाग के पूर्व सचिव और उत्तर बिहार की जल संपदा पर रिसर्च करने वाले गजानन मिश्र कहते हैं, ‘मॉनसून में जब हिमालय के इलाक़े में तेज़ बारिश होती है तो बाढ़ का आना स्वाभाविक है, पर इसे कभी आपदा के तौर पर नहीं देखा गया। तभी तो इस यहां इतनी घनी आबादी है।’

नदियों की भरमार के बाद भी यहां बड़ी संख्या में तालाब खुदवाए गए थे। हर साल बाढ़ आने पर जब नदियों का पानी फैलता तो ये तालाब पानी का बड़ा हिस्सा अपने में समाहित कर लेते। इनके कारण बाढ़ का असर कम होता और दूसरे मौसम में जब पानी का अभाव होता तो लोगों की ज़रूरतें भी पूरी होतीं। सिर्फ दरभंगा ज़िले में सात से आठ हजार तालाब हुआ करते थे। पूरे उत्तर बिहार में यह संख्या एक लाख से अधिक थी।

तालाबों के अलावा 21 हजार से अधिक वेटलैंड नदियों के नैचुरल रिर्जवायर हुआ करते थे। ये भी बाढ़ का पानी ले लेते और गर्मियों में नदी को वापस कर देते। इससे ग्राउंड वॉटर लेवल ठीक रहता।


नदियों को बांधने की भूल
आज़ादी से पहले तक तकरीबन ऐसी ही स्थिति थी। बाद में बाढ़ को लेकर बिहार सरकार की नीति बदल गई। इस सब्जेक्ट पर काम करने वाले डॉ. दिनेश मिश्र कहते हैं कि अंग्रेज़ों ने कभी हफ्तेभर की बाढ़ को समस्या के रूप में नहीं देखा और इसका समाधान करने की कोशिश अमूमन नहीं की। मगर आज़ादी के बाद बाढ़ को आपदा मानकर इन नदियों को नियंत्रित करने का अभियान शुरू हो गया। नदियों के दोनों किनारों को तटबंधों से घेर दिया गया, ताकि बाढ़ आने पर पानी दूसरे इलाक़े में फैले नहीं। दुर्भाग्यवश इस तरीके ने बाढ़ को और विकराल कर दिया।

आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। 1954 में जब बिहार में तटबंधों की कुल लंबाई सिर्फ 160 किमी थी, तब सिर्फ 25 लाख हेक्टेयर जमीन बाढ़ से प्रभावित होती थी। अब जबकि राज्य में तटबंधों की लंबाई बढ़कर 3731 किमी हो गई है तो बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का आकार घटने के बदले तीन गुना बढ़ गया है। राज्य की तीन चौथाई भूमि बाढ़ प्रभावित है। 1987 से 2014 तक के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इन 27 बरसों में ये तटबंध 378 बार टूट चुके हैं और हर साल इनमें दसियों जगह दरार आती है।

दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, ‘तटबंधों ने समस्या को बढ़ा दिया है। पहले बाढ़ का पानी धीरे-धीरे रिसते हुए आता था। अब तटबंधों के टूटने की वजह से तीव्र वेग बनकर आता है और भारी तबाही मचाता है। इन तटबंधों की सुरक्षा पर राज्य सरकार औसतन हर साल 600 करोड़ से अधिक खर्च करती है।’

तटबंधों के अलावा गंगा पर फरक्का में बना बराज भी बड़ा दोषी है। 1975 में शुरू हुए इस बराज की वजह से गंगा की धारा इस क्षेत्र में अवरुद्ध हो गई है। ऐसे में उत्तर बिहार की 80 हिमालयी नदियों को बाढ़ के दिनों में बहने का रास्ता नहीं मिलता। पहले वे बाढ़ का पानी गंगा में बहा देती थीं और गंगा उसे बंगाल की खाड़ी तक पहुंचा देती। अब बाढ़ के मौसम में गंगा पहले से ही लबालब रहती है। वह इन नदियों का पानी ख़ुद लेने की स्थिति में नहीं होती।

फिर एक बड़ी भूल यह हुई कि रहने की जगह और खेती के लिए तालाब और वेटलैंड पाटे गए। गजानन मिश्र के मुताबिक, ‘वेटलैंड सुखाने के लिए अस्सी के दशक में कई परियोजनाएं बनी थीं। अगर खेती के बदले इन वेटलैंड में मछली और मखाना पालन किया जाता तो किसानों को भी लाभ मिलता और इनका स्वरूप भी बचा रहता। लेकिन तब सरकारों की यही सोच थी कि खेती सिर्फ जमीन पर ही की जा सकती है।’

उत्तर बिहार की त्रासदी रही कि पहले अंग्रेज़ों ने यहां की संपदा को लूटा। फिर हमारी सरकारों ने प्रकृति को लेकर ग़लत अंदाज़ा लगाया। बाढ़ का आना तो नहीं रुका, लेकिन हर बरस की आपदा ने यहां के लोगों को अपनी मार से सस्ता मज़दूर ज़रूर बना दिया।

आवाज़ : गौरव आसरी
*ये लेखक के निजी विचार हैं



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